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Patna : रक्षाबंधन का धागा केवल कलाई पर बंधने वाला रेशम का तार नहीं होता। यह उस विश्वास और भरोसे का नाम है जो हर भाई अपनी बहन को देता है ताकि वह बिना किसी डर के अपने सपनों को पूरा कर सके। इस बार बिहार में रक्षाबंधन का यह भाव सिर्फ घरों की चौखट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शासन के स्तर पर एक संवेदनशील वादे के रूप में सामने आया है। सूबे के सीएम सम्राट चौधरी ने बहनों की सुरक्षा, उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखते हुए ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्होंने राज्य के लाखों परिवारों के चेहरे पर एक गहरा सुकून ला दिया है।
सड़कों पर सुरक्षा का मजबूत घेरा
जब कोई बेटी सुबह-सुबह बस्ता थामकर स्कूल या कॉलेज के लिए निकलती है, तो घर पर बैठे माता-पिता की नजरें अक्सर दरवाजे और घड़ी की सुइयों पर टिकी रहती हैं। इसी चिंता को समझते हुए सीएम सम्राट चौधरी ने महिला सुरक्षा को जमीनी स्तर पर पुख्ता करने की पहल की है। शिक्षण संस्थानों, कोचिंग सेंटरों और भीड़भाड़ वाले रास्तों पर गश्त बढ़ाने के लिए पुलिस दीदी यानी अभया ब्रिगेड को 4700 नए दोपहिया वाहन दिए जा रहे हैं। अब वर्दी में गश्त करती महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से छात्राओं के मन में एक नया आत्मविश्वास जागा है और परिजनों का यह डर दूर हुआ है कि रास्ते में उनकी बेटी अकेली है।

पीएचडी और उच्च शिक्षा के खुले नए रास्ते
अक्सर देखा जाता है कि पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद कई मेधावी बेटियां सिर्फ इसलिए अपनी आगे की पढ़ाई या शोध कार्य छोड़ देती हैं क्योंकि परिवार पर पैसों का बोझ बढ़ने लगता है। बेटियों के इसी दर्द को महसूस करते हुए मुख्यमंत्री बालिका पीएचडी फेलोशिप योजना शुरू की गई है। इस योजना के तहत 1000 छात्राओं को चार साल तक हर महीने 10,000 रुपये की आर्थिक मदद सीधे दी जाएगी। सम्राट चौधरी के इस संवेदनशील कदम से अब आर्थिक तंगी किसी भी बेटी के वैज्ञानिक या अकादमिक सपनों के आड़े नहीं आएगी और वे बिना किसी आर्थिक दबाव के शोध कार्य पूरा कर सकेंगी।
नौकरी तलाशने के बजाय खुद का कारोबार
पढ़ाई पूरी होने के बाद जब आजीविका की बात आती है, तो युवतियों को अक्सर सीमित मौकों और नौकरी की लंबी कतारों का सामना करना पड़ता है। इस सोच को बदलते हुए बिहार की बेटी स्टार्टअप चैलेंज की शुरुआत की गई है। इसके जरिए अपना काम या व्यवसाय शुरू करने की इच्छुक युवतियों को 50,000 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक की सीधी वित्तीय सहायता दी जा रही है। इसका सीधा मकसद बेटियों को केवल नौकरी तलाशने वाली नहीं बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर दूसरों को रोजगार देने वाली उद्यमी बनाना है।
सीएम सम्राट चौधरी के इन फैसलों ने यह साबित किया है कि जब प्रशासनिक फैसलों में जमीनी संवेदनाएं शामिल होती हैं, तो बदलाव घर-घर तक पहुंचता है। सुरक्षित सड़कें, उच्च शिक्षा के लिए मासिक फेलोशिप और खुद का काम शुरू करने के लिए शुरुआती पूंजी का यह पूरा ढांचा बिहार की बेटियों के जीवन में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला रहा है।
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