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Lucknow (Pawan Kumar) : जरा सोचिए, आप सामान्य तरीके से हाथ उठाएं और अचानक कंधा अपनी जगह से खिसक जाए। फिर उसे ठीक कराने के लिए डॉक्टर के पास जाना पड़े। कुछ दिन आराम के बाद जिंदगी दोबारा पटरी पर आए और फिर वही डर सताने लगे कि पता नहीं अगली बार कंधा कब खिसक जाएगा। लखनऊ के एक युवा मरीज की जिंदगी करीब चार साल तक इसी डर और परेशानी के बीच गुजरती रही। इन चार वर्षों में उसका कंधा एक-दो नहीं, बल्कि करीब 35 से 40 बार अपनी जगह से खिसक चुका था। बार-बार होने वाली इस परेशानी ने उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया था। शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनानी पड़ी और सामान्य काम करते समय भी मन में यही डर रहता था कि कहीं कंधा फिर से न खिसक जाए।
आखिरकार मरीज डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ के आर्थोपेडिक्स विभाग पहुंचा। यहां डॉक्टरों ने जांच के बाद पाया कि मामला सामान्य कंधा खिसकने का नहीं था। बार-बार डिसलोकेशन की वजह से कंधे की हड्डी की संरचना को भी नुकसान पहुंच चुका था। इसके बाद डॉक्टरों ने आधुनिक तकनीक से सर्जरी करने का फैसला लिया और मरीज का आर्थ्रोस्कोपिक बोन ब्लॉक सर्क्लाज तकनीक से सफल इलाज किया गया।
जब कंधा खिसकना जिंदगी का हिस्सा बन गया
मरीज करीब चार साल से इस समस्या से जूझ रहा था। शुरुआत में शायद उसे लगा होगा कि कंधा खिसकने की समस्या का इलाज आसानी से हो जाएगा, लेकिन जैसे-जैसे यह परेशानी बार-बार होने लगी, मुश्किल बढ़ती गई। करीब 35 से 40 बार कंधा खिसकने के बाद स्थिति ऐसी हो गई कि सामान्य गतिविधियां भी चिंता का कारण बनने लगीं। कंधे का जोड़ शरीर के सबसे ज्यादा घूमने वाले जोड़ों में शामिल है। इसी वजह से इसमें स्थिरता बनाए रखने वाली हड्डियों और आसपास के ऊतकों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। जब कंधा बार-बार अपनी जगह से निकलता है तो केवल दर्द और असहजता ही नहीं होती, बल्कि समय के साथ जोड़ की संरचना को भी नुकसान पहुंच सकता है। इस मरीज की जांच में भी कुछ ऐसा ही सामने आया। डॉक्टरों को कंधे के जोड़ में गंभीर अस्थिरता के साथ ग्लेनॉइड बोन लॉस मिला। यानी कंधे के जोड़ की हड्डी के उस हिस्से में कमी आ गई थी, जहां बाजू की हड्डी का सिर जुड़ता है। बार-बार हुए डिसलोकेशन ने समस्या को और जटिल बना दिया था।
छोटे चीरे से कंधे को दोबारा मजबूती देने की कोशिश
मरीज की स्थिति को देखते हुए आर्थोपेडिक्स विभाग की विशेषज्ञ टीम ने प्रोफेसर डॉ. पंकज अग्रवाल के नेतृत्व में आर्थ्रोस्कोपिक बोन ब्लॉक सर्क्लाज तकनीक से सर्जरी की। यह ऐसी तकनीक है जिसमें छोटे चीरे के जरिए आर्थ्रोस्कोप की मदद से कंधे के जोड़ के अंदर की स्थिति को देखा जाता है और जरूरी उपचार किया जाता है। सर्जरी के दौरान बोन ब्लॉक को कंधे के जोड़ के जरूरत वाले हिस्से में स्थापित किया गया। इसके बाद सर्क्लाज तकनीक की मदद से इसे मजबूती से स्थिर किया गया। डॉक्टरों का उद्देश्य साफ था, कंधे को दोबारा स्थिर करना और उसके बार-बार खिसकने की समस्या को कम करना। यह मामला इसलिए भी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मरीज लंबे समय से बार-बार डिसलोकेशन झेल रहा था और हड्डी की संरचना में भी नुकसान हो चुका था। ऐसे में सिर्फ कंधे को अपनी जगह पर लाना पर्याप्त नहीं था। उसकी स्थिरता को दोबारा कायम करना भी जरूरी था।
ऑपरेशन के बाद अब धीरे-धीरे लौटेगी सामान्य जिंदगी
सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति संतोषजनक है। हालांकि ऑपरेशन के बाद तुरंत पहले जैसी गतिविधियां शुरू करना संभव नहीं है। मरीज को कंधे की सुरक्षा के साथ डॉक्टरों की सलाह के अनुसार फिजियोथेरेपी और चरणबद्ध पुनर्वास कार्यक्रम का पालन करना होगा। आर्थोपेडिक्स विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. दीपक कुमार ने बताया कि बार-बार कंधा खिसकने और हड्डी की कमी वाले चुनिंदा मरीजों में बोन ब्लॉक सर्क्लाज एक प्रभावी उपचार विकल्प हो सकता है। उन्होंने बताया कि संस्थान में आधुनिक आर्थ्रोस्कोपिक और स्पोर्ट्स इंजरी सर्जरी की सुविधाओं के जरिए कंधे की जटिल समस्याओं का उपचार किया जा रहा है। सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया की जिम्मेदारी डॉ. निधि, डॉ. पी.के. दास और एनेस्थीसिया विभाग की टीम ने संभाली। पूरी टीम के सहयोग से सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हुई।
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