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Patna : बिहार के छोटे-छोटे शहरों और कस्बों के घरों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि कॉलेज से लौटी बिटिया अपनी डायरी में किसी नए कारोबार का खाका खींचती है, लेकिन आखिर में बात पैसे पर आकर अटक जाती है। घरवाले कहते हैं कि पहले पढ़ाई पूरी कर लो या कोई छोटी-मोटी नौकरी देख लो, रिस्क लेने की गुंजाइश नहीं है। मगर अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। प्रदेश की युवतियों की इसी हिचक और परेशानी को भांपते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। ‘बिहार की बेटी स्टार्टअप चैलेंज’ के जरिए राज्य की 2100 बेटियों को कारोबार शुरू करने का सीधा मौका दिया जा रहा है। सीएम सम्राट चौधरी की इस दूरदर्शी सोच ने राज्य की बेटियों को यह भरोसा दिलाया है कि अगर उनके पास विचार और मेहनत करने का जज्बा है, तो सरकार उनकी झोली खाली नहीं रहने देगी। इस योजना में चयनित बेटियों को 50 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक की सीधी मदद दी जा रही है।
अब डायरी के पन्नों में कैद नहीं रहेंगे नए आइडिया
हमारे समाज में आज भी बेटियों के हाथ में हुनर की कोई कमी नहीं है। कोई पारंपरिक मिथिला पेंटिंग को नए अंदाज में ऑनलाइन बेचना चाहती है, तो किसी के पास जैविक खेती, फूड प्रोसेसिंग या मोबाइल ऐप से जुड़ा कोई नायाब आइडिया है। कमी बस इतनी रहती थी कि शुरुआती पूंजी कहां से लाई जाए। सीएम सम्राट चौधरी ने जमीनी हकीकत को समझते हुए इस मुश्किल को आसान कर दिया है। सरकार सिर्फ आर्थिक सहायता देकर पल्ला नहीं झाड़ रही, बल्कि कारोबार को कैसे खड़ा किया जाए और बाजार में माल कैसे बेचा जाए, इसके लिए जरूरी ट्रेनिंग और सलाह भी मुहैया करा रही है। इससे आम और मध्यमवर्गीय परिवारों की बेटियों को हौसला मिला है कि उनका सपना अब सिर्फ उनकी निजी सोच नहीं, बल्कि सरकारी नीति का हिस्सा बन चुका है।
नौकरी की कतार छोड़कर अब खुद बांटेंगी अपॉइंटमेंट लेटर
अब तक बेटियों के करियर की बात आते ही सरकारी नौकरी की तैयारी या किसी दफ्तर में सुरक्षित काम की सलाह दी जाती थी। इस योजना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह सोच को पूरी तरह उलट रही है। जब किसी युवती को दो लाख रुपये की शुरुआती मदद मिलती है, तो वह अपना एक छोटा सेटअप तैयार करती है। जैसे ही उसका काम रफ्तार पकड़ता है, वह अपने साथ दो-चार और महिलाओं या युवाओं को काम पर रखती है। यानी जो बेटी कल तक रोजगार के लिए दूसरों का मुंह ताकती, वही आज अपने इलाके में रोजगार देने वाली मालिक बन रही है। मुख्यमंत्री की इस पहल से न सिर्फ महिला सशक्तिकरण को कागजों से बाहर निकालकर जमीन पर उतारा जा रहा है, बल्कि बिहार के हर जिले में स्थानीय स्तर पर नए उद्योग-धंधे भी फलने-फूलने लगे हैं।
बदलेगी घर की तकदीर और बढ़ेगा आत्मविश्वास
जब घर की बेटी अपने दम पर दो पैसे कमाकर लाती है और अपना खुद का काम संभालती है, तो पूरे परिवार और आस-पड़ोस का नजरिया बदल जाता है। 2100 महिलाओं को इस स्तर पर सहायता मिलने का मतलब है कि राज्य भर में 2100 नए उद्यम तैयार होंगे। यह केवल पैसों की मदद नहीं है, बल्कि समाज में बेटियों के सम्मान और उनके आत्मसम्मान को बढ़ाने का एक मजबूत जरिया बन चुका है। बाजार में अपने पैरों पर खड़ी होकर मोल-भाव करती और फैसले लेती इन बेटियों को देखकर दूसरी बच्चियों में भी आगे बढ़ने की हिम्मत बंध रही है। सरकार के इस कदम ने साबित कर दिया है कि सही दिशा और मजबूत इरादा हो तो राज्य की आधी आबादी पूरे प्रदेश की आर्थिक तस्वीर बदलने की ताकत रखती है।
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