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Lohardaga : अक्सर जब हम सड़क किनारे, तालाब के किनारों या जंगलों में उगी किसी जंगली घास या पौधे को देखते हैं, तो नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन लोहरदगा के रहने वाले डॉ प्रसेनजीत मुखर्जी के लिए ये सिर्फ पत्तियां या झाड़ियां नहीं, बल्कि धरती की धड़कन और विज्ञान की अनसुलझी पहेलियां रही हैं। इसी लगन और ज़मीनी मेहनत का नतीजा है कि रांची के बेड़ो स्थित करमचंद भगत कॉलेज के प्राचार्य डॉ मुखर्जी को कर्नाटक के मैसूर में आयोजित एक भव्य अंतरराष्ट्रीय समारोह में प्रतिष्ठित IBS-AIBS कंपेनियन अवार्ड 2026 से सम्मानित किया गया। देश-विदेश के दिग्गज वनस्पति शास्त्रियों की मौजूदगी में जब मंच पर उनका नाम गूंजा, तो यह सम्मान सिर्फ एक वैज्ञानिक का नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की जैव-विविधता का सम्मान बन गया।
तालाबों और जंगलों की खाक छानकर तैयार किया विज्ञान का खजाना
डॉ मुखर्जी की यह वैज्ञानिक यात्रा किसी वातानुकूलित लैब तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपना ज्यादातर वक्त झारखंड के बीहड़ों, पठारों, नमभूमियों और दूर-दराज के जंगलों में पैदल घूमते हुए बिताया है। राज्य के तालाबों में तैरने वाली जलीय वनस्पतियां हों या जंगलों में लुप्त होती जड़ी-बूटियां, उन्होंने हर पौधे की बारीकी से पड़ताल की। रांची विश्वविद्यालय से डॉ ज्योति कुमार के मार्गदर्शन में डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि लेने वाले डॉ मुखर्जी ने झारखंड की वनस्पति वर्गिकी और आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी पर जो काम किया, उसने राज्य के समृद्ध प्राकृतिक खजाने को दुनिया के सामने एक वैज्ञानिक दस्तावेज के रूप में पेश किया। उनके इस प्रयास से उन पेड़-पौधों के संरक्षण का रास्ता खुला, जिन्हें विकास की अंधी दौड़ में भुलाया जा रहा था।

मैसूर के मंच पर जब देश के शीर्ष वैज्ञानिकों ने बढ़ाया मान
इंडियन बॉटनिकल सोसायटी की ओर से आयोजित 49वें वार्षिक और तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का माहौल बेहद खास था। देशभर से जुटे वैज्ञानिकों के बीच जब डॉ मुखर्जी मंच पर पहुंचे, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। सोसायटी की अध्यक्ष डॉ शांति शर्मा, सचिव डॉ शेषु लवानिया, सीएफटीआरआई मैसूर के निदेशक डॉ पी गिरिधर और मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय सहारनपुर की कुलपति डॉ वाई विमला ने संयुक्त रूप से उन्हें यह सम्मान सौंपा। इस साल सम्मेलन की चर्चा का केंद्र पादप विज्ञान में नई प्रगति और जैव ऊर्जा के लिए जरूरी नवाचार था, और इस मंच पर डॉ मुखर्जी के जमीनी शोध को सराहा जाना यह साबित करता है कि स्थानीय प्रकृति की समझ ही भविष्य के बड़े बदलावों की नींव है।
साधारण कॉलेज से राष्ट्रीय फलक तक, हर चेहरे पर गर्व की मुस्कान
एक शिक्षक और कॉलेज प्रिंसिपल के तौर पर डॉ मुखर्जी रोजाना सैकड़ों विद्यार्थियों को प्रकृति और विज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं। उनकी इस बड़ी उपलब्धि की खबर जैसे ही लोहरदगा और बेड़ो पहुंची, सहकर्मियों और छात्रों के चेहरे खुशी से खिल उठे। रांची विश्वविद्यालय परिवार से लेकर राज्य के कई वरिष्ठ शिक्षाविदों ने उन्हें शुभकामनाएं भेजीं। उनके शोध निर्देशक डॉ टी घोष, पूर्व कुलपति डॉ ज्योति कुमार, पूर्व कुलपति डॉ कामिनी कुमार, वर्तमान कुलपति डॉ सरोज शर्मा, कुलसचिव डॉ राजकुमार शर्मा और डॉ एमजी तिवारी ने इसे पूरे राज्य के लिए ऐतिहासिक पल बताया। उनका मानना है कि संसाधनों की कमी के बावजूद अगर इरादे पक्के हों, तो झारखंड की मिट्टी से निकला वैज्ञानिक भी दुनिया के नक्शे पर अपनी अमिट छाप छोड़ सकता है।
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