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Pawan Thakur
दिन-रात दफ्तरों में बजती फोन की खनखनाहट, टीवी स्क्रीन पर लाल रंग में दौड़ती ‘ब्रेकिंग न्यूज’, टीआरपी की आपाधापी, नेताओं के खोखले वादे और सत्ता के गलियारों में तैरती कड़वी सच्चाइयां… एक पत्रकार की जिंदगी इन्हीं दायरों में दम तोड़ती रहती है। दुनिया मानकर चलती है कि खबरों का पीछा करते-करते, हादसों को कवर करते-करते और आंकड़ों का हिसाब लगाते-लगाते एक पत्रकार का दिल पत्थर हो चुका होता है। माना जाता है कि फैक्ट्स, डेडलाइन्स और पब्लिसिटी की इस बेरहम दुनिया में संवेदनशीलता के लिए कोई जगह नहीं बचती। लेकिन जब इसी भागदौड़, शोर और पथरीली जमीन के बीच से एहसासों का कोई चश्मा फूट पड़ता है, तो ज़माना ठिठककर देखने को मजबूर हो जाता है।
बिहार की टीवी पत्रकारिता का एक जाना-माना, कड़क और बेबाक चेहरा… आनंद कौशल। सालों तक ईटीवी बिहार से लेकर ‘हमार टीवी’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार चैनलों में अपनी पैनी नजर से खबरों की नब्ज टटोलने वाले, वर्तमान में बिहार सरकार के मीडिया विशेषज्ञ और WJAI यानी वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्यरत कड़क पत्रकार आनंद कौशल ने साहित्य के आंगन में एक ऐसी दस्तक दी है, जिसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है। इस कड़क पत्रकार के कोट के पीछे एक ऐसा दिल धड़क रहा था, जो बरसों से मोहब्बत, बिछड़ने के दर्द और तन्हाई के ज़हर को घूंट-घूंट पी रहा था। उसी दर्द का निचौड़ है उनका पहला गजल संग्रह… ‘हमनशीं’।
साहित्यागम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनका पहला गजल संग्रह ‘हमनशीं’ बाजार में आ चुका है। Amazon, Flipkart, Google Play Store और Google Books पर उपलब्ध महज ₹200 की यह किताब केवल कागज का एक पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह उस इंसान के भीतर की खामोश चीख है जिसने दुनिया को बहुत करीब से देखा, सहा और महसूस किया है।
कैमरे के पीछे छिपा वो इंसान, जो खामोशी से रोता रहा
अमूमन लोग आनंद कौशल को एक कुशल मीडिया रणनीतिकार, एक सख्त एडिटर और निष्पक्ष विश्लेषक के रूप में ही जानते रहे हैं। लेकिन ‘हमनशीं’ उनके उस रूहानी चेहरे को बेपर्दा करती है, जो अब तक अल्फाज की चादर में दुबका हुआ था। पत्रकारिता इतिहास दर्ज करती है कि समाज में क्या हुआ, लेकिन साहित्य यह दर्ज करता है कि उस घटना के बीच से गुज़रते हुए एक इंसान पर क्या बीती। आनंद कौशल ने खबरों की अपनी डायरी के पीछे एक और डायरी छिपा रखी थी… जज्बातों की डायरी। जब कैमरे की लाइटें बुझ जाती थीं, जब स्टूडियो की चकाचौंध शांत हो जाती थी और जब एक रिपोर्टर अपने घर के सूने कमरे में अकेले बैठता था, तब शुरू होती थी उनकी असली रिपोर्टिंग… अपने ही दिल के अंदर की रिपोर्टिंग।
जब वे अपनी गजल में लिखते हैं…“सब कुछ था पास मेरे, एक तेरे इश्क के सिवा… आज हूं बीमार-ए-इश्क, कुछ नहीं हैं, बस तन्हाइयां…”
तो यह कोई तुकबंदी या कागजी शायरी नहीं लगती। यह उस इंसान का कबूलनामा है जिसने जिंदगी में कामयाबी, ओहदा और शोहरत तो सब हासिल कर ली, लेकिन जब ढलती शाम को पीछे मुड़कर देखा, तो पाया कि हाथ में सिर्फ खालीपन और किसी अपने की गहरी कमी रह गई।
न बनावटी अल्फाज, न शब्दों का जाल… सिर्फ नश्तर सा चुभता सच
आज का दौर सोशल मीडिया की तेज रफ्तार का दौर है। जमाना ‘इंस्टेंट’ हो चुका है, जहां दो लाइनों की रील्स और चंद सेकेंड्स की शायरी पर लोग तालियां बजाकर आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे उथले दौर में ‘हमनशीं’ पाठक को रोकती है, उसका हाथ थामती है और उसे ठहरकर अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करती है। इस संग्रह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि लेखक ने इसमें शब्दों का कोई आडंबर नहीं रचा है। इसमें फारसी के भारी-भरकम शब्दों का बोझ नहीं है, न ही दिखावटी अलंकारों का प्रदर्शन है। इसमें वही सादगी है जो बरसों की तन्हाई और तजुर्बों से छनकर बाहर आती है।
जरा इस शेर की शिद्दत और गहराई को महसूस कीजिए… “लोग कहते हैं आवारा मेरी आवारगी देखकर… ये बेचारगी ‘कौशल’ तेरी फितरत ही तो है…”
इस शेर में कोई शिकवा नहीं है, न ही किसी पर कोई इल्जाम। इसमें अपनी नियति और अपनी बेचारगी की एक ऐसी शांत स्वीकारोक्ति है, जो सीधे कलेजे में जाकर लगती है। यह किसी एक कवि की बात नहीं है, बल्कि यह उस हर शख्स की दास्तान है जिसने मोहब्बत में सब कुछ गंवाकर भी अपनी गरिमा को बचाए रखा।
हिंदी की सादगी में उर्दू की मिठास
‘हमनशीं’ की भाषा बेहद खास है। इसमें उस आम बोलचाल का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें इंसान अपनी तन्हाई में खुद से बातें करता है। लेखक आनंद कौशल ने हिंदी की सहजता और उर्दू की नफासत को इस तरह घोला है कि यह संग्रह किसी बड़े साहित्यकार से लेकर पहली बार शायरी पढ़ने वाले आम पाठक तक, सबको अपने आगोश में ले लेता है।
आनंद कौशल की गजलों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे दर्द को कभी निराशा नहीं बनने देते। उनकी शायरी में तन्हाई है, लेकिन बिखराव नहीं है; बिछड़ने का मलाल है, लेकिन शिकायतों का शोर नहीं है। और सबसे बड़ी बात… उनमें उम्मीद की एक धीमी सी लौ हमेशा जलती रहती है।
एक ऐसी किताब, जो पढ़ी नहीं… उम्र भर महसूस की जाएगी
पत्रकारिता की दुनिया से निकलकर साहित्य के आसमान में ऐसी दमदार मौजूदगी दर्ज कराना आसान काम नहीं होता। आनंद कौशल ने यह साबित कर दिया है कि वे केवल खबरों के कुशल शिल्पी ही नहीं हैं, बल्कि मानवीय भावनाओं के भी गहरे पारखी हैं।
‘हमनशीं’ केवल लाइब्रेरी की अलमारी में सजाने के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक अनमोल तोहफा है जो शब्दों में सिर्फ तुकबंदी नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की धड़कन ढूंढते हैं। यह किताब हमें याद दिलाती है कि भले ही दुनिया कितनी भी तेज भागने लगे, लेकिन मोहब्बत, तन्हाई और संवेदनाओं का समंदर आज भी इंसान के सीने में हिलौरे मार रहा है।
अगर आप भी रोजमर्रा की भागदौड़ से थक चुके हैं, अगर आप अपने बीचे हुए पलों से फिर से मिलना चाहते हैं और अपने जख्मों को बड़े प्यार से सहलाना चाहते हैं, तो ‘हमनशीं’ के पन्नों को एक बार जरूर खोलिए। इसके अल्फाज आपको अपने ही अक्स से रूबरू करा देंगे, क्योंकि कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, उम्र भर महसूस की जाती हैं।
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