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Ranchi : 12 रोज बाद सही सलामत घर लौट चुके मासूम अंश और अंशिका अब कुछ दिन पहले तक सिस्टम की नजरों से दूर थे। रोजमर्रा की जद्दोजहद, सीमित साधन और अनिश्चित भविष्य के बीच उनका बचपन सिमटता जा रहा था। इन बच्चों की जिंदगी में उस वक्त उम्मीद की एक किरण दिखी, जब उन्हें रेस्क्यू किया गया और रांची डासला की टीम उनके पास पहुंची।
जब अधिकारी फाइल नहीं, हालात देखने आए
झालसा के एक्सक्यूटिव चेयरमैन सुजीत नारायण प्रसाद के निर्देश और रांची व्यवहार न्यायालय के आदेश पर डालसा सचिव राकेश रोशन खुद दोनों बच्चों और उनके परिवार से मिलने पहुंचे। यह मुलाकात औपचारिक नहीं थी। सचिव ने जमीन पर बैठकर बच्चों की बातें सुनीं, माता-पिता की परेशानियां समझीं और उनकी रोज की मुश्किलों को करीब से जाना।
पहचान से अधिकार तक का सफर
बच्चों के पास आधार कार्ड तक नहीं था, जिससे वे सरकारी योजनाओं से बाहर थे। डालसा सचिव ने मौके पर ही जरूरी दस्तावेज तैयार कराने की पहल की। साथ ही CWC से तालमेल कर बच्चों की स्वास्थ्य जांच और आगे के संरक्षण की प्रक्रिया शुरू कराई गई, ताकि उन्हें सरकार की लाभकारी योजनाओं से जोड़ा जा सके।
पढ़ाई का सपना, जो अब अधूरा नहीं रहेगा
गरीबी के कारण बच्चे फिलहाल आंगनबाड़ी तक सीमित थे। लेकिन बातचीत के दौरान जब बच्चों ने पढ़ने की इच्छा जाहिर की, तो डालसा ने उनके लिए स्पॉन्सरशिप योजना का रास्ता खोला दिया। डालसा के इस कदम से अब अंश और अंशिका की पढ़ाई में कोई भी बाधा नहीं आयेगी और दोनों पढ़-लिख कर अपने सपने पूरे कर सकेंगे।
मन का बोझ हल्का करने की कोशिश
डालसा ने सिर्फ कागजी मदद तक खुद को सीमित नहीं रखा। बच्चों और उनके माता पिता के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था की गई। माता पिता को समझाया गया कि बच्चों की देखभाल सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, उनका भविष्य भी है।
कानून, जो डराने नहीं, सहारा देने आए
मौके पर मौजूद लोगों को बताया गया कि अगर समाज में कहीं भी बच्चों से जुड़ी कोई घटना होती है या कानूनी मदद की जरूरत पड़ती है, तो 15100 पर संपर्क किया जा सकता है या सीधे डालसा कार्यालय आया जा सकता है। यह संदेश साफ था कि कानून सिर्फ दंड नहीं देता, जरूरत के वक्त साथ भी खड़ा होता है। गरीबी के अंधेरे में पले इन बच्चों के लिए डालसा की यह पहल सिर्फ सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस भरोसे की शुरुआत है, जिसमें एक बेहतर कल की उम्मीद छुपी है।
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