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Ranchi : सिर पर मां का आंचल न रहे, तो इंसान भीतर से कितना टूट जाता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन इन दिनों अपनी जिंदगी के सबसे भावुक और कठिन दौर से गुजर रहे हैं। मां स्व. रूपी सोरेन के चले जाने का गम सीने में दबाए वे अपने पैतृक गांव नेमरा में हैं। लेकिन इस गहरे व्यक्तिगत दुख के बीच भी जो बात दिल को छू जाती है, वह है उनका अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण। आमतौर पर ऐसे मौकों पर राजकाज के पहिए थम जाया करते हैं, मगर सीएम हेमंत सोरेन ने अपने दुख को जनता के काम के आड़े नहीं आने दिया। नेमरा के मिट्टी की खुशबू वाले पैतृक घर से ही उन्होंने शासन की बागडोर थामे रखी, फाइलों का निपटारा किया और यह साबित कर दिया कि एक सच्चा जनसेवक अपने आंसुओं के बीच भी जनता की उम्मीदों को बेसहारा नहीं छोड़ता।

पैतृक आवास से ही चली सरकार, मुख्य सचिव से की सीधी बात
श्राद्धकर्म की व्यस्तताओं और गमगीन माहौल के बीच सीएम हेमंत सोरेन ने सुनिश्चित किया कि राज्य का कोई भी जरूरी काम न अटके। उन्होंने पैतृक आवास में ही मुख्य सचिव के साथ राज्य के महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों पर लंबी चर्चा की और जरूरी फाइलों का तेजी से निपटारा किया। फोन उठाकर आला अधिकारियों से सीधे बात की, उनसे योजनाओं और व्यवस्थाओं का फीडबैक लिया और जरूरी दिशा-निर्देश दिए। सचिवालय से सैकड़ों किलोमीटर दूर गांव की चौखट पर बैठकर इस तरह जनहित के फैसले लेना यह दिखाता है कि उनके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक अटूट जिम्मेदारी है।

सुबह परिजनों के साथ दातून और पानी की रस्म, जमीन से जुड़े बेटे की सादगी
सरकारी दायित्वों को मुस्तैदी से संभालने के साथ ही सीएम हेमंत सोरेन एक समर्पित बेटे का फर्ज भी पूरी सादगी से निभा रहे हैं। शनिवार सुबह नेमरा के घर में कोई वीआईपी प्रोटोकॉल नहीं दिखा। सीएम ने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ जमीन पर बैठकर श्राद्धकर्म से जुड़ी पारंपरिक रस्में पूरी कीं। परिजनों के साथ मिलकर सुबह दातून, पानी देने और भोजन परोसने का काम खुद संभाला। चेहरे पर मां को खोने की गहरी उदासी और आंखों में नमी साफ दिख रही थी, लेकिन हाथों में सेवा का वही भाव था जो एक संस्कारी बेटे की पहचान होती है। रस्मों के तुरंत बाद वे खुद चलकर आयोजन स्थल पर पहुंचे और टेंट से लेकर भोजन की एक-एक व्यवस्था की बारीकी से पड़ताल की, ताकि आने वाले किसी भी व्यक्ति को कोई असुविधा न हो।

गांव की चौपाल में सिर झुकाकर पहुंचे, मांझी हड़ाम से मांगी स्वीकृति
सत्ता के शीर्ष पर होने के बाद भी अपनी जड़ों और परंपराओं का सम्मान कैसे किया जाता है, इसका उदाहरण उन्होंने नेमरा में पेश किया। संथाली समाज की सदियों पुरानी रीति के अनुसार उन्होंने गांव के मांझी हड़ाम प्रमुख की बैठक में पूरी विनम्रता के साथ शिरकत की। समाज के बुजुर्गों और प्रबुद्ध जनों के बीच बैठकर उन्होंने मां के श्राद्धकर्म के आयोजन के लिए बाकायदा अनुमति मांगी। स्थानीय परंपराओं के मुताबिक हर रस्म को कैसे निभाना है, इस पर समाज की राय ली। इस तरह सामाजिक नियमों और मर्यादाओं के आगे सिर झुकाकर उन्होंने यह संदेश दिया कि पद चाहे कोई भी हो, समाज और संस्कृति से बड़ा कोई नहीं होता।
दुख बांटने पहुंचे लोगों का खुद रखा ख्याल, जारी रहा मुलाकातों का सिलसिला
मां के निधन की खबर के बाद से ही नेमरा में सांत्वना देने वालों का तांता लगा हुआ है। केंद्रीय मंत्री संजय सेठ के अलावा राज्य सरकार के कई मंत्री, विधायक और आम नागरिक सीएम से मिलने उनके पैतृक आवास पहुंचे। अपने भारी मन के बावजूद सीएम हेमंत सोरेन ने हर किसी से मुलाकात की, उनका हालचाल जाना और उनके ढांढस बंधाने पर हाथ जोड़कर आभार व्यक्त किया। दुख की इस घड़ी में भी हर आगंतुक का ख्याल रखना और अपनी सादगी बनाए रखना उनकी संवेदनशीलता को बयां करता है। नेमरा का यह पूरा मंजर साफ बताता है कि सीएम हेमंत सोरेन सिर्फ राजनीति के खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील इंसान हैं जो पारिवारिक मर्यादा और सार्वजनिक सेवा के संतुलन को बखूबी जीना जानते हैं।

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