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Home » इंडोनेशिया में नवाजे गये असाध्य रोगों की आखिरी उम्मीद… डॉ यूएस वर्मा
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इंडोनेशिया में नवाजे गये असाध्य रोगों की आखिरी उम्मीद… डॉ यूएस वर्मा

September 11, 2026No Comments4 Mins Read
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Bali/Ranchi : जब कोई डॉक्टर मेडिकल की दो अलग-अलग धाराओं को एक साथ साधकर मरीजों के चेहरे पर मुस्कान लौटाने लगे, तो वह केवल चिकित्सक नहीं बल्कि समाज के लिए उम्मीद बन जाता है। रांची के जाने-माने वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. यूएस वर्मा ने चिकित्सा जगत में कुछ ऐसा ही मुकाम हासिल किया है। इंडोनेशिया के बाली में आयोजित 30वें इंटरनेशनल होम्योपैथिक चिकित्सा सेमिनार में जब उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया, तो वहां मौजूद दुनिया भर के डॉक्टरों ने खड़े होकर तालियां बजाईं। विश्व विख्यात कैंट होम्योपैथिक फार्मास्युटिकल संस्थान द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत और इंडोनेशिया सहित विभिन्न देशों के करीब 85 बड़े डॉक्टर जुटे थे, जहां डॉ. वर्मा का दशकों पुराना अनुभव चर्चा का केंद्र रहा।

एलोपैथी और होम्योपैथी के संगम से तैयार किया इलाज का अनोखा मॉडल

डॉ. यूएस वर्मा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे एलोपैथिक और होम्योपैथिक दोनों ही विधाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त विशेषज्ञ हैं। जहां आमतौर पर इन दोनों पद्धतियों के जानकार एक-दूसरे की सीमाओं पर बहस करते हैं, वहीं डॉ. वर्मा ने दोनों के तालमेल से मरीजों को नई जिंदगी दी है। उन्होंने करीब तीन दशक तक बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी के पद पर रहकर हजारों लोगों की सेवा की। वर्तमान में वे रांची के कचहरी चौक निकट डिप्टी पाड़ा स्थित यूएस पॉली क्लीनिक एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर के निदेशक के तौर पर दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। कोरोना काल की चुनौती हो या फिर लकवा, लिवर, किडनी और दिल की पुरानी बीमारियां, उन्होंने अपने सटीक इलाज से अनगिनत असाध्य मामलों में राहत पहुंचाई है।

विदेशों में गूंजा डॉ. वर्मा के तजुर्बे का डंका

बाली में आयोजित इस प्रतिष्ठित सेमिनार की अध्यक्षता संस्थान के प्रबंधक डॉ. सोमनाथ देव ने की। मंच पर जब डॉ. वर्मा को शॉल ओढ़ाकर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया, तो यह पूरे झारखंड और देश के लिए गर्व का क्षण था। इसके बाद डॉ. वर्मा ने जब सेमिनार को संबोधित किया, तो उनकी दूरदर्शी सोच साफ नजर आई। उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के यह बात रखी कि आपातकालीन स्थिति और सर्जरी के लिए एलोपैथी आज भी सबसे बड़ा वरदान है, लेकिन जहां बात बार-बार उभरने वाले रोगों, साइटिका, जोड़ों के दर्द, डायबिटीज, फाइब्रॉयड और उम्र बढ़ने के साथ होने वाली शारीरिक दिक्कतों की आती है, वहां होम्योपैथी बिना किसी साइड इफेक्ट के चमत्कारिक रूप से काम करती है।

साधारण व्यक्तित्व और असाधारण उपलब्धियों का सफर

डॉ. वर्मा को इससे पहले भी उनकी बेमिसाल सेवाओं के लिए झारखंड सेवा रत्न, राष्ट्रीय सेवा रत्न, विश्व चिकित्सा सेवा रत्न और मिलेनियम आइकन अवार्ड जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। बावजूद इसके, उनका स्वभाव बेहद सरल और नए डॉक्टरों को आगे बढ़ाने वाला रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर विशिष्ट अतिथि के रूप में बिहार के गया से आए डॉ. वीरेंद्र कुमार, डॉ. चंद्रशेखर, डॉ. अर्चना कुमारी और बाराचट्टी के डॉ. ब्रजेश कुमार को भी सम्मान देकर उनका हौसला बढ़ाया गया।

सिंगापुर और मलेशिया तक फैलाया भारतीय चिकित्सा का ज्ञान

इंडोनेशिया में अपनी सफलता का परचम लहराने के बाद डॉ. यूएस वर्मा का सफर यहीं नहीं थमा। वतन वापसी के दौरान उन्होंने सिंगापुर और मलेशिया में भी कैंट होम्योपैथिक फार्मास्युटिकल द्वारा आयोजित विशेष सत्रों में शिरकत की। वहां उन्होंने विदेशी डॉक्टरों के सामने होम्योपैथी के नए अनुसंधानों, आधुनिक तकनीकों और जटिल बीमारियों के इलाज पर अपने व्याख्यान दिए। अपने ज्ञान और अनुभव के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले डॉ. वर्मा आज चिकित्सा जगत के उन गिने-चुने दिग्गजों में शामिल हैं, जिनकी लगन नई पीढ़ी के डॉक्टरों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

इसे भी पढ़ें : CM की मां का चेकअप किया मशहूर डॉक्टर यूएस वर्मा ने, क्या बोले… जानें

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