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Ranchi : अदालत की चौखट पर जब रिश्ते पहुंचते हैं, तो अक्सर बिखरने का डर ज्यादा होता है। कागजों में दर्ज आरोप, तारीखों का अंतहीन सिलसिला और दोनों तरफ से तनी हुई भवें। रांची की रहने वाली ज्योति टोप्पो और प्रवीण केरकेट्टा के रिश्ते की डोर भी कुछ इसी मोड़ पर आकर उलझ गई थी। ईसाई रीति-रिवाज से हुई शादी के बाद जिंदगी ठीक चल रही थी, लेकिन फिर छोटी-मोटी खटपट ने बड़ा रूप ले लिया। बात इतनी बिगड़ी कि दोनों पिछले करीब दो साल से अलग-अलग रहने लगे। दूरियां बढ़ीं तो मामला फैमिली कोर्ट तक पहुंच गया, जहां ज्योति ने पति के खिलाफ भरण-पोषण का केस दायर कर दिया।
जब तल्खियों के बीच खुली बातचीत की खिड़की
मुकदमा जब फैमिली कोर्ट-1 के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश रमेश चन्द्रा के पास पहुंचा, तो उन्होंने कानून के चश्मे से देखने से पहले इस रिश्ते को एक और मौका देने की सोची। मामला सुलह के लिए रांची डालसा के मध्यस्थता केंद्र भेज दिया गया। डालसा सचिव राकेश रौशन ने इसकी जिम्मेदारी मध्यस्थ अमरेंद्र कुमार ओझा को सौंपी। सचिव राकेश रौशन ने बस इतना कहा कि रिश्ता टूटना नहीं चाहिये। दोनों पक्षों के वकील भी साथ आए। ज्योति की तरफ से रौनक फिरदौस और प्रवीण की ओर से सौरभ राज व हुमा कौशर ने मोर्चा संभाला। वकीलों ने यहां केस जीतने की बजाय एक उजड़ते घर को बचाने की ठानी।
बंद कमरे में निकलीं मन की बातें, पिघलती गई शिकायतों की ‘बर्फ’
शुरुआती मुलाकातों में दोनों के चेहरे पर गुस्सा और झिझक साफ दिख रही थी। दो साल का मनमुटाव इतनी आसानी से कहां जाता। मध्यस्थ और वकीलों ने बारी-बारी से दोनों को सुना। किसी ने अपनी बात रखी तो किसी ने अपनी मजबूरी बताई। करीब तीन से चार बैठकों में जब दोनों ने दिल खोलकर बातें कीं, तो समझ आया कि झगड़ा किसी बड़ी बात पर नहीं, बस अहम और संवाद की कमी का था। धीरे-धीरे गिले-शिकवे धुलने लगे। दोनों ने फैसला किया कि अब पुरानी बातों को पीछे छोड़ेंगे। तय हुआ कि पति पत्नी की जरूरतों का पूरा ख्याल रखेंगे, पत्नी पति का सम्मान करेंगी और दोनों एक-दूसरे के परिजनों को पूरा मान देंगे।

विदाई पर खिले चेहरे और फूलों का गुलदस्ता
सुलहनामे पर दस्तखत होते ही मध्यस्थता केंद्र का माहौल बदल गया। जिस रिश्ते में कल तक खटास थी, वहां अब नई शुरुआत की उम्मीद थी। डालसा सचिव राकेश रौशन ने दोनों को अपने कमरे में बुलाकर फूलों का गुलदस्ता भेंट किया। उन्होंने दोनों को समझाया कि दांपत्य जीवन की गाड़ी आपसी समझदारी और थोड़े से समझौते से चलती है, इसलिए अब कभी पुरानी बातों को कुरेदने की जरूरत नहीं है। हाथ में बुके और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए जब दोनों बाहर निकले, तो दो साल पुराना बिखरा हुआ परिवार एक बार फिर जुड़ चुका था।
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