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Pakur (Jaydev Kumar) : पत्थर खदानों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करने का रास्ता आसान बनाने के लिए अगर सरकारी दस्तावेजों से ही छेड़छाड़ कर दी जाए तो क्या होगा? पाकुड़ में सामने आया मामला कुछ ऐसा ही है। जिले में पत्थर खनन से जुड़े एक कथित फर्जीवाड़े ने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में ला दिया है। आरोप है कि खनन कारोबारियों ने जिला खनन कार्यालय से जारी एक अहम रिपोर्ट में झोलझाल कर उसे इस तरह पेश किया कि नियमों की बड़ी रुकावट ही गायब हो गई। अब इसी मामले में 13 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद खनन जगत में खलबली मच गई है।
ऑडिट टीम की नजर पड़ी तो खुलने लगी परतें
कहानी की शुरुआत एक ऑडिट रिपोर्ट से हुई। वित्तीय वर्ष 2022-23 में महालेखाकार कार्यालय ने झारखंड में खनिज प्रबंधन से जुड़े मामलों की जांच की। ऑडिट के दौरान पाकुड़ के कुछ खनन मामलों की फाइलें खंगाली गईं तो अधिकारियों को कागजों में कुछ ऐसा नजर आया जिसने सभी को चौंका दिया। जांच में पता चला कि जिला खनन कार्यालय से जारी Contiguous Report और परिवेश पोर्टल पर अपलोड की गई रिपोर्ट में अंतर है। यहीं से शक गहराया और फिर एक-एक दस्तावेज की पड़ताल शुरू हुई।
कागजों में कम हो गया खदान का रकबा!
खनन विभाग के मुताबिक कुछ मामलों में खदानों के आसपास के कुल क्षेत्रफल को कम दिखाया गया। जबकि खनन कार्यालय से जारी मूल रिपोर्ट में रकबा कहीं ज्यादा था। यही वह खेल था जिसने पूरे मामले को गंभीर बना दिया। दरअसल, पर्यावरणीय मंजूरी देने के लिए खदान क्षेत्र का आकार बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर क्षेत्र बड़ा है तो मंजूरी की प्रक्रिया भी ज्यादा सख्त होती है। लेकिन आरोप है कि दस्तावेजों में बदलाव कर क्षेत्र को छोटा दिखा दिया गया और फिर उसी आधार पर पर्यावरणीय मंजूरी हासिल कर ली गई। जांच अधिकारियों का कहना है कि अगर यह आरोप सही साबित होता है तो यह सिर्फ दस्तावेजी गलती नहीं बल्कि सुनियोजित धोखाधड़ी का मामला बनता है।
रांची तक पहुंची फर्जी रिपोर्ट
बताया जाता है कि बदली हुई रिपोर्ट को परिवेश पोर्टल पर अपलोड किया गया। इसी रिपोर्ट के आधार पर राज्य स्तरीय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन प्राधिकरण यानी SEIAA ने पर्यावरणीय स्वीकृति जारी कर दी। यानी जिस दस्तावेज के आधार पर मंजूरी मिली, उसी दस्तावेज की सच्चाई अब सवालों के घेरे में है। खनन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मूल रिपोर्ट और अपलोड की गई रिपोर्ट का मिलान करने पर कई विसंगतियां सामने आई हैं। यही वजह है कि मामला अब आपराधिक जांच तक पहुंच गया है।
पहले मंजूरी गई, फिर पट्टे भी रद्द हुए
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, संबंधित मामलों में जारी पर्यावरणीय स्वीकृतियां वापस ले ली गईं। इसके बाद डीसी स्तर से भी कार्रवाई हुई और कई खनन पट्टों को रद्द कर दिया गया। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। सवाल यह था कि आखिर सरकारी दस्तावेज में बदलाव किसने किया, कैसे किया और इसका फायदा किसे मिला? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए अब पुलिस जांच शुरू हुई है।
महाधिवक्ता की राय के बाद दर्ज हुई FIR
मामला इतना गंभीर था कि इसे लेकर खान निदेशालय ने झारखंड हाई कोर्ट के महाधिवक्ता से कानूनी राय ली। राय मिलने के बाद संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ। इसके बाद जिला खनन पदाधिकारी राजेश कुमार ने नगर थाना में लिखित शिकायत दी। शिकायत के आधार पर नगर थाना में कांड संख्या 123/2026 दर्ज कर ली गई।
13 नामजद, और भी बढ़ सकती है सूची
एफआईआर में नौ पूर्व खनन पट्टाधारियों और चार खनन पट्टा आवेदकों को नामजद किया गया है। इनमें पाकुड़ और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कई कारोबारी शामिल हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती दौर में है। दस्तावेजों की जांच के दौरान अगर किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसका नाम भी मामले में जोड़ा जा सकता है।
अब फाइलों से निकलेगा सच
पुलिस की सबसे पहले यह पता लगाना है कि मूल रिपोर्ट में बदलाव कब और किस स्तर पर किया गया। क्या यह काम किसी एक व्यक्ति ने किया या फिर इसके पीछे पूरा नेटवर्क था? जांच टीम अब खनन विभाग की फाइलें, परिवेश पोर्टल पर अपलोड रिकॉर्ड, पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़े दस्तावेज और डिजिटल ट्रेल की जांच करेगी।
खनन कारोबार में मची बेचैनी
यहां याद दें कि पाकुड़ देश के बड़े स्टोन माइनिंग क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां पत्थर खनन से जुड़े कारोबार का सालाना कारोबार करोड़ों रुपये में है। ऐसे में इस मामले के सामने आने के बाद पूरे खनन जगत में बेचैनी बढ़ गई है। फिलहाल पुलिस की जांच शुरू हो चुकी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि फाइलों में दबे इस कथित खेल का पूरा सच कब और कैसे सामने आता है।
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