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Pakur (Jaydev Kumar) : सीमा मुर्मू बस चार साल की थी। गांव के आंगन में मिट्टी से खेलती, गुड़िया से बातें करती और जब कभी पिता मिकाइल खेत से लौटते, तो उनके गले से लिपट जाती। मां साजोनि के लिए वो पूरे घर की हंसी थी। लेकिन 22 अक्टूबर की उस शाम, जब परिवार अमड़ापाड़ा के पाडेरकोला हटिया से लौट रहा था, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यही सफर उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाएगा।
टक्कर जिसने सब कुछ बदल दिया
लिट्टीपाड़ा थाना क्षेत्र के कालाझोर के पास अचानक सामने से आती एक मोटरसाइकिल ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। पल भर में सब कुछ उलट-पुलट गया। सड़क पर गिरी साजोनि दर्द से कराह रही थी, मिकाइल बेसुध थे और मासूम सीमा खून से लथपथ पड़ी थी। आसपास के लोगों ने किसी तरह तीनों को लिट्टीपाड़ा अस्पताल पहुंचाया। “सीमा तो उस वक्त भी मुझे देख मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी,” मिकाइल ने रोते हुए कहा। लेकिन उस मुस्कान में जान बाकी नहीं रही।
इलाज और इंतजार के बीच थम गई सांसें
तीनों को जंगीपुर, पश्चिम बंगाल के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। मिकाइल और साजोनि दर्द में थे, लेकिन सबसे ज़्यादा चिंता उन्हें अपनी छोटी बेटी की थी। इलाज के दौरान गुरुवार को सीमा ने दम तोड़ दिया। चार साल की बच्ची की नन्ही सांसें अब हमेशा के लिए थम गईं। “डॉक्टर ने कहा कि हमने पूरी कोशिश की, पर वो बच नहीं सकी।” यह सुनते ही परिवार के सपने जैसे बिखर गए।
गांव का गुस्सा और मातम का सैलाब
जब सीमा का शव गांव पहुंचा, तो हर आंख नम थी। लोग चुप थे, पर भीतर से टूट चुके थे। किसी ने कहा, “इस सड़क ने कई घर उजाड़े हैं, अब तो स्पीड ब्रेकर बनना ही चाहिए।” गुस्साए ग्रामीणों ने सूरजबेड़ा के पास सड़क पर बच्ची का शव रखकर जाम कर दिया। वे चाहते थे कि अब किसी और सीमा की जान इस सड़क पर न जाए। करीब ढाई घंटे तक सड़क जाम रहा। बीडीओ के प्रतिनिधि और पुलिस पहुंचे। मृतक परिवार को पंद्रह हजार रुपये की तत्काल सहायता दी गई और सड़क पर स्पीड ब्रेकर लगाने का आश्वासन मिला। तब जाकर जाम हटाया गया।
हर मां की आंख में अब डर है
गांव की औरतें अब बच्चों को अकेले सड़क पार नहीं करने देतीं। “सीमा की मौत ने हम सबको डरा दिया,” एक महिला ने कहा। “हम चाहते हैं कि प्रशासन अब ध्यान दे, वरना और बच्चे मरेंगे।”
पिता अब भी अस्पताल में हैं, पर शायद भीतर से खाली हो चुके हैं
मिकाइल और साजोनि का इलाज अब भी चल रहा है, लेकिन सीमा के बिना उनका जीवन अधूरा है। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मिकाइल अब भी पूछते हैं, “क्या सीमा ठीक है?” कोई जवाब नहीं दे पाता।
एक सवाल जो अब भी सड़क पर गूंज रहा है
लिट्टीपाड़ा की वो सड़क अब भी वैसी ही है… टूटी, ऊबड़-खाबड़ और खतरनाक। लोग पूछते हैं, “कब तक मासूम जिंदगियां यूं ही खत्म होती रहेंगी?” सीमा की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस लापरवाही का आईना है जो अक्सर तब तक नहीं दिखती जब तक कोई जान नहीं जाती।
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