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Pakur (Jaydev Kumar) : कभी पहचान के लिए संघर्ष करता यह छोटा-सा जिला आज देशभर में झारखंड की नई पहचान बन गया है। नीति आयोग द्वारा आयोजित “फोर स्टेट चैलेंज” में पाकुड़ ने वह कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। फाइनेंशियल इंक्लूजन कैटेगरी में देशभर में दूसरा स्थान — यह सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक कहानी है मेहनत, जज्बे और बदलाव की।
‘प्रोजेक्ट बदलाव’ से बदलती ज़िंदगियां
कुछ साल पहले तक यहां की कई पीवीटीजी (PVTG) महिलाएं आर्थिक रूप से बेहद कमजोर थीं। न बैंक की जानकारी, न कोई स्थायी आय का जरिया। लेकिन फिर शुरू हुआ ‘प्रोजेक्ट बदलाव’।
इस पहल ने गांवों की मिट्टी में छिपी प्रतिभा को बाहर निकाला।
महिलाओं को प्रशिक्षण, रोजगार, बैंकिंग सेवाओं से जोड़ना और आत्मनिर्भर बनाना — यही मिशन बना पाकुड़ प्रशासन का।
धीरे-धीरे इन महिलाओं ने अपने हाथों में सुई-धागा, बांस, कपड़ा, और हुनर थामा। फिर शुरू हुआ ‘सखी मार्ट’ — जहां वही महिलाएं आज अपने बनाए उत्पाद बेचती हैं। कभी दूसरों पर निर्भर रहने वाली ये दिदियाँ आज खुद अपने घर की कमाई का आधार हैं।
जब पाकुड़ ने दी देशभर के जिलों को टक्कर
जिला के डीसी मनीष कुमार बताते हैं, “हमें नीति आयोग को यह दिखाना था कि कैसे हमने दूर-दराज की महिलाओं को वित्तीय रूप से सशक्त किया है। हमने पूरी कहानी — चुनौतियाँ, समाधान और सफलता — सब प्रेजेंटेशन में रखी। और यही हमारी ताकत बनी।”
इस मजबूत प्रस्तुति और ज़मीनी बदलाव के आधार पर ही नीति आयोग ने पाकुड़ को देशभर में दूसरा स्थान दिया। अब 9 अक्टूबर को मसूरी के लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में पाकुड़ को यह सम्मान दिया जाएगा।
सखी दीदियों की आंखों में चमक
महुआझरना गांव की सखी दीदी प्रीति हेम्ब्रम मुस्कुराते हुए कहती हैं — “पहले तो हमें बैंक जाने में डर लगता था, अब हम खुद दूसरों को सिखाते हैं कि खाता कैसे खोलते हैं, लोन कैसे लेते हैं। अब हम अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए खुद जिम्मेदार हैं।” ऐसी हजारों कहानियां हैं, जो बताती हैं कि असली बदलाव कहीं दूर सरकारी दफ्तरों में नहीं, बल्कि गांवों की गलियों में जन्म लेता है।
पाकुड़ की सफलता, झारखंड का गौरव
आज जब नीति आयोग की रैंकिंग में पाकुड़ का नाम दूसरे स्थान पर चमक रहा है, तो यह झारखंड के लिए गर्व का क्षण है।
यह साबित करता है कि संसाधनों की कमी कोई बाधा नहीं, अगर इच्छाशक्ति सशक्त हो।
जिला के डीसी मनीष कुमार कहते हैं “यह सम्मान सिर्फ प्रशासन का नहीं, पूरे जिले की मेहनती महिलाओं का है। हमने देखा कि जब विश्वास और सहयोग मिलता है, तो समाज खुद बदलाव लिखता है।”
आने वाले कल का वादा
मसूरी में 9 अक्टूबर को मिलने वाला यह सम्मान सिर्फ एक पुरस्कार नहीं — यह उन सखी दिदियों के हाथों की मेहनत का प्रमाण है, जिनके पसीने से पाकुड़ की पहचान बनी। झारखंड के इस छोटे से जिले ने दिखा दिया है कि ‘बदलाव’ किसी फाइल या योजना से नहीं, लोगों के दिल से आता है। और आज, जब पाकुड़ की यह कहानी देशभर में सुनी जाएगी, तो हर सखी दिदी कहेगी — “अब हम सिर्फ नाम की नहीं, काम की पहचान हैं।”
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