अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi : मान लीजिए आपके इलाके में जमीन के नीचे खनिज है। कहीं कोयला निकलता है, कहीं लौह अयस्क, कहीं चूना पत्थर और कहीं ऐसी रेत या पत्थर, जिसकी जरूरत हर दिन मकान और सड़क बनाने में पड़ती है। अब अगर खनिज से जुड़े कानून में बदलाव हो जाए तो सबसे पहला सवाल यही उठेगा कि इसका असर जमीन पर पड़ेगा या नहीं? राज्य सरकार के अधिकार रहेंगे या नहीं? और सबसे बड़ी बात, इससे राज्य को मिलने वाली कमाई का क्या होगा?
MMDR संशोधन विधेयक 2026 को लेकर इन दिनों कुछ ऐसे ही सवाल लोगों के बीच चर्चा में हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में भी इसे लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि शोर से अलग हटकर यह समझा जाए कि आखिर संसद से पारित इस संशोधन में कहा क्या गया है और आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को संसद ने 13 अगस्त 2026 को पारित किया है। विधेयक के सेक्शन 9(घ) में खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर लगाए जाने वाले कर, उपकर और दूसरे शुल्क से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट किया गया है। इनमें खनिज की मात्रा, कीमत या रॉयल्टी के आधार पर लगाए जाने वाले शुल्क भी शामिल हो सकते हैं।
यहीं से पूरी कहानी शुरू होती है। क्योंकि कानून में केंद्र की भूमिका बढ़ने की बात सामने आते ही यह सवाल उठने लगा कि कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि राज्यों के अधिकार कम हो जाएंगे?
पहली गलतफहमी यहीं दूर कर लीजिए, जमीन नहीं छीनी जा रही
इस पूरे मामले में सबसे पहले जमीन की बात समझना जरूरी है। अगर किसी राज्य की जमीन पर खनिज मौजूद है तो सिर्फ MMDR संशोधन के कारण उस जमीन का मालिकाना हक केंद्र सरकार के पास नहीं चला जाता। जमीन का मालिकाना हक और जमीन के नीचे मौजूद खनिजों से जुड़े कर तथा नियमन अलग-अलग विषय हैं।
इसे ऐसे समझिए। जमीन किसकी है, यह एक सवाल है। उस जमीन से निकलने वाले खनिज पर कौन सा नियम लागू होगा और उससे जुड़ा कर या शुल्क कैसे तय होगा, यह दूसरा सवाल है।
MMDR संशोधन का संबंध दूसरे सवाल से है। इसका उद्देश्य खनिज क्षेत्र में कराधान और नियमन की व्यवस्था को ज्यादा स्पष्ट करना है। इसलिए यह कहना कि कानून बदलने के बाद राज्यों की जमीन केंद्र सरकार के कब्जे में चली जाएगी, इस संशोधन को समझने का सही तरीका नहीं है। राज्यों की भूमिका भी खत्म नहीं हो रही है। खासकर उन खनिजों में, जिनका इस्तेमाल हमारे रोजमर्रा के निर्माण कार्यों में होता है।
रेत से मकान तक, गौण खनिजों पर राज्य का नियंत्रण रहेगा
किसी शहर में नया मकान बन रहा हो, गांव में सड़क बन रही हो या किसी जिले में पुल का निर्माण चल रहा हो, वहां रेत, बजरी, बोल्डर और मोरम की जरूरत पड़ती है। आम आदमी के लिए ये सिर्फ निर्माण सामग्री हैं, लेकिन सरकार के लिए ये गौण खनिज यानी Minor Minerals हैं। इन खनिजों को लेकर राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी। करीब 50 गौण खनिज राज्यों के नियंत्रण में ही रहेंगे। इनके नियमन और प्रशासन से जुड़े फैसलों में राज्यों की भूमिका बरकरार रहेगी। यानी आपके जिले में रेत की व्यवस्था कैसे होगी, उससे जुड़े स्थानीय नियम क्या होंगे और गौण खनिजों के प्रशासन को किस तरह चलाया जाएगा, इसमें राज्य सरकारों की भूमिका बनी रहेगी। यही वजह है कि MMDR संशोधन को केवल केंद्र और राज्य के अधिकारों की लड़ाई के रूप में देखना पूरे विषय को अधूरा समझना होगा।
दूसरा बड़ा सवाल- आखिर राज्यों की कमाई का क्या होगा?
अब आते हैं उस सवाल पर जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा है। खनिज वाले राज्यों के लिए खनन सिर्फ जमीन के नीचे छिपा संसाधन नहीं है, बल्कि यह राजस्व का भी बड़ा जरिया है। राज्य सरकारों को खनन से रॉयल्टी मिलती है। खदानों की नीलामी से ऑक्शन प्रीमियम मिलता है। खनन प्रभावित इलाकों के लिए जिला खनिज फाउंडेशन यानी DMF की व्यवस्था है। इसके अलावा GST में भी राज्यों का हिस्सा होता है। इसलिए जब खनिज कानून में बदलाव होता है तो राज्य स्वाभाविक रूप से यह देखना चाहते हैं कि कहीं उनकी कमाई पर असर तो नहीं पड़ेगा।
दिए गए प्रावधानों के मुताबिक राज्यों के राजस्व में कटौती करने का उद्देश्य नहीं है। राज्यों का हिस्सा करीब 90 प्रतिशत के स्तर पर बने रहने की बात कही गई है। मतलब साफ है कि सुधार का मतलब राज्य की कमाई कम करना नहीं है। रॉयल्टी से मिलने वाला राजस्व जारी रहेगा। ऑक्शन प्रीमियम से राज्यों को मिलने वाला हिस्सा भी बना रहेगा। DMF के जरिए मिलने वाले लाभ भी जारी रहेंगे और GST में राज्यों का हिस्सा भी सुरक्षित रहेगा। इसलिए इस संशोधन को समझते समय एक बात याद रखना जरूरी है कि खनिज कानून में बदलाव और राज्यों के राजस्व में कटौती, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
फिर बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?
अब एक और सवाल खड़ा होता है। अगर जमीन नहीं जा रही, राज्यों की कमाई कम नहीं हो रही और गौण खनिजों पर राज्य का नियंत्रण भी बना हुआ है, तो आखिर इतना बड़ा संशोधन करने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब खनिज क्षेत्र की बदलती जरूरतों में छिपा है।
आज देश में सड़कें बन रही हैं, रेलवे लाइनें बिछ रही हैं, बिजली परियोजनाएं लग रही हैं, उद्योगों का विस्तार हो रहा है और शहरों के साथ छोटे कस्बों में भी निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। इन सभी कामों के लिए खनिज चाहिए। जितनी बड़ी अर्थव्यवस्था होगी, उतनी ही ज्यादा खनिज की जरूरत होगी। लेकिन खनिज क्षेत्र में अगर नियमों को लेकर ही स्पष्टता नहीं होगी तो विवाद भी होंगे और परियोजनाओं की रफ्तार भी प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए कराधान और नियमन के नियमों को ज्यादा साफ करने की जरूरत महसूस की गई। राज्यों की ओर से करीब 14 तरह की मौजूदा लेवी लगाए जाने की स्थिति में कई मामलों में कर व्यवस्था जटिल हो सकती है। ऐसे में सरकार का जोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जिसमें नियमों को लेकर भ्रम कम हो और सभी पक्षों को अपनी जिम्मेदारी साफ तौर पर पता हो।
केंद्र का नियमन और राज्य के अधिकार, दोनों साथ कैसे चलेंगे?
यही वह हिस्सा है जिसे समझना थोड़ा जरूरी है। विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने के अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं करता। साथ ही केंद्र सरकार को इनसे जुड़े प्रावधानों को विनियमित करने की शक्ति देता है। यानी व्यवस्था ऐसी बनाने की कोशिश है जिसमें राज्य अपने अधिकारों के साथ काम करें और देशभर में खनिज क्षेत्र से जुड़े नियमों में जरूरत के मुताबिक एकरूपता भी आए। आम भाषा में कहें तो राज्य की भूमिका खत्म करना मकसद नहीं है, बल्कि यह कोशिश है कि अलग-अलग स्तरों पर लागू नियमों के बीच टकराव और अस्पष्टता कम हो।
खनिज का फायदा सिर्फ खदान वाले इलाके को नहीं, पूरे राज्य को मिलता है
खनिज से मिलने वाला पैसा सिर्फ सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहता। जहां खनन होता है, वहां ट्रक चलते हैं, मजदूर काम करते हैं, मशीनें लगती हैं, छोटे कारोबारी सामान बेचते हैं और स्थानीय स्तर पर कई तरह की आर्थिक गतिविधियां होती हैं। खनन प्रभावित इलाकों में DMF के जरिए विकास कार्य भी किए जाते हैं। सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी जरूरतों पर पैसा खर्च किया जाता है। इसलिए अगर खनिज क्षेत्र में निवेश बढ़ता है और नियम स्पष्ट होते हैं तो उसका असर केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय रोजगार और कारोबार पर भी इसका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि खनिज क्षेत्र में सुधार को राज्यों के आर्थिक हितों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सबसे जरूरी बात, डरने से पहले प्रावधान समझिए
MMDR संशोधन विधेयक को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम तीन बातों पर है। पहली, क्या राज्यों की जमीन चली जाएगी? दूसरी, क्या राज्यों का खनन राजस्व खत्म हो जाएगा? और तीसरी, क्या रेत-बजरी जैसे गौण खनिजों पर राज्यों का नियंत्रण खत्म हो जाएगा?
दिए गए प्रावधानों के मुताबिक तीनों सवालों का जवाब नहीं है। राज्यों की जमीन का मालिकाना हक इस संशोधन से खत्म नहीं होता। गौण खनिजों पर राज्यों का नियंत्रण बना रहता है और राज्यों के प्रमुख खनिज राजस्व स्रोतों में कटौती का उद्देश्य नहीं रखा गया है। करीब 90 प्रतिशत राजस्व हिस्सा राज्यों के पास बने रहने की बात कही गई है। असल बदलाव खनिज क्षेत्र में कराधान और नियमन को अधिक स्पष्ट करने से जुड़ा है।
देश को आगे बढ़ाने के लिए खनिज संसाधनों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। लेकिन खनिज से जुड़े नियम जितने साफ होंगे, उतना ही विवाद कम होगा और काम करने की व्यवस्था बेहतर हो सकती है। साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि राज्यों के अधिकार और आर्थिक हित सुरक्षित रहें।
इस पूरे मामले को इसलिए केंद्र बनाम राज्य की नजर से देखने के बजाय यह समझना ज्यादा जरूरी है कि खनिज संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो, राज्यों को उनका राजस्व मिलता रहे और स्थानीय लोगों को भी इसका फायदा मिले। आखिरकार जमीन राज्य की हो, खनिज देश की संपत्ति हो और उससे मिलने वाला लाभ जनता तक पहुंचे, यही किसी भी खनिज नीति की असली कसौटी होनी चाहिए।

