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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : रामगढ़ जिले के पतरातू का हनुमानगढ़ी मोहल्ला इन दिनों गहरे सदमे में है। यहां रहने वाले 39 वर्षीय मुन्ना कुमार हर दिन की तरह अपने काम पर निकले थे, लेकिन किसी को क्या पता था कि वह वापस घर नहीं लौटेंगे। खैरा मांझी द्वार के पास जिंदल कंपनी की स्टाफ बस से उनकी स्कूटी को टक्कर हो गयी और एक पल में सब कुछ खत्म हो गया। मुन्ना कुमार सिर्फ एक नाम नहीं थे, बल्कि अपने परिवार का सहारा थे। गांव में लोग उन्हें एक ऐसे इंसान के रूप में जानते थे जो छोटे-मोटे चिकित्सा काम कर लोगों की मदद करते थे। उनकी कमाई से ही घर चलता था, बच्चों की पढ़ाई होती थी और परिवार के सपने जुड़े थे।
शव के साथ बैठा परिवार, आंखों में सवाल ही सवाल
शनिवार शाम जब पोस्टमार्टम के बाद मुन्ना का शव घर पहुंचा, तो चीख-पुकार से माहौल भर गया। पत्नी अस्मिता देवी बार-बार बेहोश हो रही थीं, बच्चों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उनके पिता के साथ क्या हो गया। दर्द और गुस्से के बीच परिजन एक फैसला लेते हैं। वे शव को लेकर बलकुदरा स्थित जिंदल प्लांट के स्टाफ गेट पहुंचते हैं। वहीं सड़क किनारे शव रखकर धरने पर बैठ जाते हैं। उनके चेहरे पर सिर्फ एक सवाल था कि अब इस परिवार का सहारा कौन बनेगा।

मांग सिर्फ पैसे की नहीं, भविष्य की थी
धरने पर बैठे परिजनों की मांग सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि मुन्ना की पत्नी को नौकरी मिले ताकि घर चल सके। बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी कोई उठाए ताकि उनके सपने अधूरे न रह जाएं। परिवार के एक सदस्य ने कहा कि मुन्ना ही सब कुछ थे। अब उनके बिना घर चलाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में सिर्फ सांत्वना से काम नहीं चलेगा, ठोस मदद चाहिए।
कंपनी और परिजनों के बीच लंबी बातचीत
धरना करीब चार घंटे तक चला। इस दौरान कंपनी के अधिकारी, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचे। जिंदल प्लांट के हेड केबी सिंह ने परिजनों से बातचीत की। कंपनी की ओर से यह कहा गया कि बस ठेके पर चल रही थी, इसलिए सीधे तौर पर कंपनी जिम्मेदार नहीं है। यह बात सुनकर परिजन और आक्रोशित हुए, लेकिन बातचीत जारी रही।
आखिरकार मिला भरोसा, लेकिन दर्द बाकी है
लंबी बातचीत के बाद कंपनी ने इंसानियत के आधार पर मदद का आश्वासन दिया। कहा गया कि मुन्ना की पत्नी अस्मिता देवी को रोजगार दिलाने की कोशिश की जाएगी और बच्चों की पढ़ाई में सहयोग किया जाएगा। साथ ही बस मालिक के जरिए एक लाख रुपये की सहायता और बीमा राशि दिलाने में मदद की बात कही गई। इन आश्वासनों के बाद परिजन धीरे-धीरे शांत हुए और धरना खत्म कर दिया। लेकिन सवाल अब भी बाकी हैं।
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