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Ramgarh (Prince Verma) : कुछ दिन पहले तक रजरप्पा मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा था। जिन दुकानों पर सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती थी, वहां सिर्फ टूटे हुए टीन, बिखरी हुई लकड़ियां और भविष्य की चिंता में डूबे चेहरे नजर आ रहे थे। कई दुकानदारों की आंखों में आंसू थे, क्योंकि दुकान ही उनकी जिंदगी थी, दुकान ही उनके बच्चों की पढ़ाई थी और दुकान ही घर का चूल्हा जलाने का जरिया थी। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। जिन 254 परिवारों को लग रहा था कि उनकी दुनिया उजड़ गई, उनके चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी है। वजह है जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग की वह पहल, जिसने इन परिवारों को नई उम्मीद दी है।
‘जब दुकान टूटी तो लगा सब कुछ खत्म हो गया’
रजरप्पा में मां छिन्नमस्तिका के दर्शन के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हुई। प्रशासनिक नजरिए से यह जरूरी था, लेकिन इस कार्रवाई के बाद 254 दुकानदारों की जिंदगी अचानक बदल गई। किसी की दुकान 20 साल पुरानी थी तो किसी की 30 साल। कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनकी दूसरी पीढ़ी उसी दुकान के सहारे पल-बढ़ रही थी। दुकान टूटने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि अब घर कैसे चलेगा? एक दुकानदार की आंखें भर आईं। उसने कहा, “मां के दरबार में दुकान लगाकर बच्चों को पढ़ाया, बेटियों की शादी की। जब दुकान टूटी तो लगा सब कुछ खत्म हो गया।”
हाईकोर्ट ने कहा- इंसानियत भी जरूरी है
मामला हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने साफ कहा कि मंदिर परिसर को व्यवस्थित बनाना जरूरी है, लेकिन जिन लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है, उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी होनी चाहिए। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और पुनर्वास की दिशा में तेजी से काम शुरू हुआ।
फाइलों से निकलकर जमीन पर उतरा फैसला
अक्सर लोग कहते हैं कि सरकारी योजनाएं फाइलों में घूमती रहती हैं। लेकिन इस बार फैसला सीधे जमीन पर दिखाई दे रहा है। रामगढ़ के डीसी ऋतुराज ने अधिकारियों के साथ बैठक कर तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया। सीएसआर फंड से 54 लाख रुपये की लागत से अस्थायी दुकानों का निर्माण शुरू कराया गया। जब तक स्थायी दुकानें नहीं बन जातीं, तब तक पार्किंग क्षेत्र में दुकानदारों को दुकानें उपलब्ध कराई जाएंगी।
कच्ची दुकानें, लेकिन उम्मीदें पक्की
बांस-बल्ली और एस्बेस्टस शीट से बनने वाली ये दुकानें देखने में भले साधारण हों, लेकिन इनकी कीमत उन परिवारों से पूछिए जिनके घर का चूल्हा इन्हीं पर निर्भर है। कई दुकानदार निर्माण स्थल पर पहुंचकर काम को देख रहे हैं। कोई मजदूरों से पूछ रहा है कि दुकान कब तक तैयार होगी, तो कोई अपने भविष्य की नई योजना बना रहा है। एक महिला दुकानदार ने कहा, “दुकान टूटने के बाद कई रातें सो नहीं पाए। अब लगता है कि फिर से जिंदगी पटरी पर लौट आएगी।”
अधिकारियों की टीम भी मैदान में
पुनर्वास योजना को सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखा गया है। अंचल अधिकारी दीपक मिंज और सहायक अभियंता शुभम सचान लगातार स्थल का निरीक्षण कर रहे हैं। अधिकारियों की कोशिश है कि दुकानदारों को जल्द से जल्द दुकानें मिल जाएं, ताकि उनकी आमदनी दोबारा शुरू हो सके।
आस्था भी बचेगी, रोजगार भी
रजरप्पा सिर्फ एक मंदिर नहीं है। यह सैकड़ों परिवारों की जिंदगी का सहारा भी है। यहां फूल बेचने वाले हैं, प्रसाद बेचने वाले हैं, खिलौने वाले हैं, चाय-नाश्ते की छोटी दुकानें चलाने वाले हैं। इसी वजह से प्रशासन ने ऐसी व्यवस्था तैयार की है, जिसमें श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिले और दुकानदारों का रोजगार भी सुरक्षित रहे।
स्थायी दुकानों का सपना भी होगा पूरा
डीसी ऋतुराज का कहना है कि फिलहाल अस्थायी दुकानें बनाई जा रही हैं। भविष्य में जब स्थायी दुकानें बनकर तैयार होंगी, तब हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार पूरी पारदर्शिता के साथ दुकानों का आवंटन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन मिलकर इस योजना को आगे बढ़ा रहे हैं, ताकि रजरप्पा में विकास और रोजगार दोनों साथ-साथ चल सकें।
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