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Home » जब गांवों में बुझ रही थी उम्मीद, तब जलती रही संजय मेहता के कोशिशों की लौ
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जब गांवों में बुझ रही थी उम्मीद, तब जलती रही संजय मेहता के कोशिशों की लौ

January 9, 2026No Comments4 Mins Read
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संजय
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Giridih : झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर इलाके में पिछले कई महीनों से शामें कुछ अलग थीं। सूरज तो रोज उगता-ढलता था, लेकिन घरों में उजाला नहीं लौटता था। मोबाइल की हर घंटी पर दिल धड़क उठता था और हर अनजान खबर डर बढ़ा देती थी। कारण था पश्चिम अफ्रीकी देश नाइजर में अपहृत पांच मजदूर, जिनकी सलामती को लेकर पूरा इलाका बेचैन था।

वह दिन, जब सब कुछ थम सा गया

25 अप्रैल 2025, नाइजर की राजधानी नियामे से करीब 115 किलोमीटर दूर तिल्लाबेरी जिले का सकोइरा क्षेत्र। यहीं पावर ट्रांसमिशन परियोजना में काम कर रहे झारखंड के पाँच मजदूर अचानक आतंकियों के कब्जे में चले गए। उसी हमले में 12 नाइजर सैनिकों की जान चली गई। खबर जब गांव पहुंची, तो जैसे समय थम गया। संजय महतो के घर बूढ़ी मां ने चूल्हा जलाना छोड़ दिया। चंद्रिका महतो के बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया। फलजीत, राजू और उत्तम महतो के परिवारों की रातें जागते बीतीं। हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा था, वे जिंदा भी हैं या नहीं।

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उम्मीद की पहली किरण

इसी अंधेरे समय में परिवारों के साथ खड़े हुए संजय मेहता। घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने विदेश मंत्रालय को पत्र लिखे, दूतावास से संपर्क साधा और पीड़ित परिवारों से मिलने गांव पहुंचे। वे सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि उस वक्त परिवारों के लिए भरोसे की सबसे बड़ी उम्मीद बन गए।

खाली हाथ नहीं लौटे संजय मेहता

संजय मेहता जब परिवारों से मिले, तो उनके पास कोई बड़ी घोषणा नहीं थी। लेकिन उनके पास था भरोसा। उन्होंने कहा, “जब तक हमारे भाई सुरक्षित नहीं लौटेंगे, तब तक प्रयास नहीं रुकेंगे।” त्योहार आए, बीते, लेकिन परिवारों की हालत नहीं बदली। ऐसे में आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्च के लिए संजय मेहता ने कंपनी प्रबंधन से समन्वय कर परिवारों को सहारा दिलाया।

कूटनीति के साथ इंसानियत की परीक्षा

इस मामले में विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास, नाइजर की सेना और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति के बीच लगातार बातचीत होती रही। सीमावर्ती इलाका होने के कारण माली जैसे देशों से भी संपर्क साधा गया। हर दिन एक नई चुनौती थी, हर रात एक नई चिंता।

दिल्ली से नाइजर तक गूंजा दर्द

संजय मेहता खुद दिल्ली स्थित नाइजर गणराज्य के दूतावास पहुंचे। उन्होंने ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि ये सिर्फ मजदूर नहीं, भारत के बेटे हैं। उनके पीछे बूढ़े माता-पिता, पत्नी और छोटे बच्चे हैं, जो हर दिन डर में जी रहे हैं।

वह फोन कॉल जिसने सब बदल दिया

फिर एक दिन वह खबर आई, जिसका इंतजार महीनों से था। मजदूर सुरक्षित हैं और भारत लौट रहे हैं। संजय मेहता ने सबसे पहले परिवारों को फोन किया। किसी घर में रोने की आवाज आई, किसी में भगवान को धन्यवाद दिया गया। कई परिवारों के लिए यह जीवन का सबसे भावुक पल था।

मुंबई में पहली सांस सुकून की

पाँचों मजदूर फिलहाल मुंबई में हैं, जहां उनका स्वास्थ्य परीक्षण चल रहा है। लंबी कैद, डर और अनिश्चितता के बाद अब वे सुकून की सांस ले पा रहे हैं। घर लौटने की तैयारी में हैं, अपनों से मिलने की आस में।

गांव में लौटी रौनक

गिरिडीह के बगोदर क्षेत्र के दोनदलों और मुंडरो पंचायत में अब फिर से चूल्हे जल रहे हैं। बच्चों की हंसी लौट आई है। जिन घरों में सन्नाटा था, वहां अब बातचीत हो रही है। यह सिर्फ पाँच मजदूरों की वापसी नहीं, बल्कि पूरे इलाके की उम्मीदों की जीत है।

“मजदूरों की सुरक्षित वापसी ही हमारा संकल्प था”

संजय मेहता कहते हैं, “परिवारों ने जो दर्द झेला है, उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। हमारी कोशिश बस इतनी थी कि वे अपने घर सुरक्षित लौटें। आगे भी हम हर पीड़ित के साथ खड़े रहेंगे।”

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