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News Samvad : भारतीय रेलवे यात्रियों को बेहतर सफर और साफ-सफाई की सुविधा देने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च करता है। रेलवे की ओर से सफाई और रखरखाव पर बड़े बजट का दावा भी किया जाता है। लेकिन नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट ने रेलवे के कामकाज और खर्च के तरीके पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा मामला सुपरफास्ट ट्रेनों के नाम पर यात्रियों से वसूले गए अतिरिक्त शुल्क का है। ऑडिट में सामने आया कि जिन ट्रेनों को सुपरफास्ट का दर्जा दिया गया, उनमें से 190 से ज्यादा ट्रेनें तय औसत रफ्तार हासिल ही नहीं कर पा रही थीं।
सुपरफास्ट का शुल्क लिया, लेकिन रफ्तार 55 किमी से कम
सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2022 से मार्च 2023 के बीच रेलवे ने यात्रियों से करीब 168 करोड़ रुपये सुपरफास्ट सरचार्ज के तौर पर वसूले। रेलवे के नियम साफ कहते हैं कि किसी ट्रेन पर सुपरफास्ट सरचार्ज तभी लगाया जा सकता है, जब शुरुआती और अंतिम स्टेशन के बीच उसकी औसत रफ्तार कम से कम 55 किलोमीटर प्रति घंटा हो। अगर ट्रेन की औसत रफ्तार इससे कम है तो उसे मेल या एक्सप्रेस श्रेणी में रखा जाना चाहिए। ऑडिट के दौरान रेलवे के इंटीग्रेटेड कोच मैनेजमेंट सिस्टम के आंकड़ों की जांच की गई। इसमें 190 से ज्यादा ऐसी ट्रेनें सामने आईं, जो सुपरफास्ट का दर्जा पाने के लिए जरूरी 55 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत रफ्तार पूरी नहीं कर रही थीं। यानी यात्रियों से सुपरफास्ट ट्रेन का अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा था, जबकि ट्रेन की रफ्तार तय मानक पर खरी नहीं उतर रही थी। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। सीएजी ने इन ट्रेनों के प्रदर्शन की आगे भी जांच की। रिपोर्ट के मुताबिक चिन्हित ट्रेनों में से करीब 100 ट्रेनें मार्च 2026 तक भी 55 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत रफ्तार हासिल नहीं कर पाईं। इसके बावजूद इन ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों से सुपरफास्ट सरचार्ज लिया जा रहा था। सीएजी ने इसे रेलवे के अपने नियमों और निर्देशों के पालन में कमी माना है।
सफाई व्यवस्था पर भी यात्रियों की नाराजगी
सीएजी की रिपोर्ट में रेलवे की सफाई व्यवस्था को लेकर भी तस्वीर बहुत अच्छी नहीं मिली। खासकर लंबी दूरी की ट्रेनों में सफाई और रखरखाव को लेकर यात्रियों की शिकायतें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेन में ऑनबोर्ड सफाई व्यवस्था से करीब 50 प्रतिशत यात्री संतुष्ट नहीं हैं। सर्वे में 40 प्रतिशत से ज्यादा यात्रियों ने टॉयलेट में बदबू और पानी जमा होने की शिकायत की। यानी सफर के दौरान जिस सुविधा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वहीं यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। इसके अलावा 50 प्रतिशत से ज्यादा यात्री ऑनबोर्ड हाउसकीपिंग सेवा और सफाई कर्मचारियों की कमी से भी असंतुष्ट मिले। रेलवे में बायो टॉयलेट लगाए जाने के बाद उम्मीद थी कि ट्रेनों में स्वच्छता की स्थिति बेहतर होगी। लेकिन सीएजी की जांच में इनके रखरखाव को लेकर भी सवाल सामने आए। कई जगह व्यवस्था होने के बावजूद उसका रखरखाव और नियमित निगरानी ठीक तरीके से नहीं हो पाई।
बजट मिला, लेकिन काम और खर्च का हिसाब साफ नहीं
सीएजी ने रेलवे की सफाई व्यवस्था के लिए बजट और उसके इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक सफाई और रखरखाव के लिए बजट की कमी नहीं बताई गई, लेकिन जमीनी स्तर पर काम और वित्तीय अनुशासन में कमी मिली। ऑडिट टीम को यह साफ तौर पर नहीं बताया जा सका कि सफाई व्यवस्था पर कितना बजट आवंटित हुआ, उसमें से कितना खर्च किया गया और कितना पैसा इस्तेमाल नहीं हो सका। बजट आवंटन और वास्तविक खर्च का पारदर्शी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। सीएजी ने वित्तीय कार्रवाई का सटीक हिसाब नहीं होने को गंभीर अनियमितता माना है। आधुनिक तरीके से कोच की सफाई के लिए ऑटोमेटिक कोच वाशिंग प्लांट जैसी परियोजनाएं भी मंजूर की गई थीं। लेकिन इनकी प्रगति समय पर नहीं हो सकी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन शून्य रहा। झांसी और ग्वालियर जैसे प्रमुख स्टेशनों के लिए बजट उपलब्ध होने के बावजूद संबंधित परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं। सीएजी की रिपोर्ट से साफ है कि रेलवे के सामने सिर्फ ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने की चुनौती नहीं है। यात्रियों से किस सुविधा के नाम पर कितना शुल्क लिया जा रहा है, उस सुविधा के लिए तय मानक पूरे हो रहे हैं या नहीं और सफाई के नाम पर मिले पैसे का कितना इस्तेमाल हुआ, इन सभी सवालों का जवाब भी जरूरी है। सुपरफास्ट सरचार्ज और सफाई व्यवस्था से जुड़े ये आंकड़े बताते हैं कि रेलवे में बजट और नियम होने के बावजूद उनके सही तरीके से इस्तेमाल और निगरानी पर अभी काफी काम करने की जरूरत है।
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