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Ranchi : रांची की जुमार नदी के तट पर हवा हल्की ठंडी थी, और आसमान में धूप धीरे धीरे फैल रही थी। इस बीच कुछ लोग चुपचाप लकड़ियां सजा रहे थे, कुछ अग्नि की तैयारी कर रहे थे। यह कोई सामान्य दिन नहीं था। यहां 34 ऐसे लोगों को अंतिम विदाई दी जानी थी जिनका जीवन तो कहीं खो गया, लेकिन मरने के बाद भी कोई उनका दावा करने नहीं आया। यह जिम्मेदारी उठाई मुक्ति संस्था ने। कई सालों से यह संस्था उन लोगों के लिए खड़ी है जिनके पास ना कोई नाम बचता है, ना पहचान। लेकिन इंसान होने का हक तो हर किसी को समान है, और यही सोच उन्हें बार बार इन घाटों तक खींच लाती है।
मोर्चरी से लेकर नदी किनारे तक की अंतिम यात्रा
रविवार की सुबह संस्था के सदस्य रिम्स की मोर्चरी में इकट्ठा हुए। मृतकों की पहचान पर किसी ने दावा नहीं किया था। कई शव दिनों से वहीं पड़े थे। धीरे धीरे उन्हें स्ट्रेचर पर रखा गया, पैक किया गया और गाड़ियों में सजाया गया। किसी की उम्र का पता नहीं, किसी की कहानी का। बस इतना ही पता कि आज उनकी अंतिम यात्रा सम्मान के साथ पूरी होगी। जब वाहन जुमार नदी के करीब पहुंचे, तो माहौल और भी शांत हो गया। लोग लाइन से खड़े थे, जैसे किसी परिवार की विदाई हो रही हो।
अध्यक्ष ने दी मुखाग्नि
संस्था के अध्यक्ष प्रवीण लोहिया ने हर शव को अपनी जिम्मेदारी समझकर मुखाग्नि दी। 34 बार अग्नि जली। 34 बार धुआं आसमान की ओर उठा। जैसे हर बार किसी की अनसुनी कहानी हवा में घुल रही हो। आशीष भाटिया ने शांत आवाज में अंतिम अरदास की। आसपास खड़े लोग आंखें झुकाए थे। किसी का मन यह सोचकर भारी था कि इन लोगों के जीवन में कौन होगा, या होगा भी या नहीं। लेकिन आज यहां खड़े लोग ही उनका परिवार बन गए थे।
अब तक 2098 अज्ञात शवों को मिल चुकी सद्गति
प्रवीण लोहिया बताते हैं कि मुक्ति संस्था अब तक 2098 अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी है। हर शव के साथ एक सवाल भी आता है, कि वह कौन था, कैसा जीवन रहा होगा, किसने खोया होगा। कई सवाल बिना जवाब के ही रह जाते हैं। फिर भी संस्था हर शव के साथ समान सम्मान रखती है। क्योंकि उनके लिए यह केवल सेवा नहीं, बल्कि मानवता है।
लंबी खामोशी में खड़े लोग
कार्यक्रम में कई चेहरे थे। रवि अग्रवाल, हरीश नागपाल, आर.के. गांधी, संदीप कुमार, आदित्य शर्मा, सुदर्शन अग्रवाल, अमित किशोर, बलबीर जैन, मोती सिंह, विजय धानुका, सुनील अग्रवाल सहित कई लोग चुपचाप खड़े रहे। हर व्यक्ति वहीं खड़ा रहा, जब तक अंतिम चिता शांत नहीं हुई।
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