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Garhwa : गढ़वा के राम साहू मुख्यमंत्री उत्कृष्ट उच्च विद्यालय के बरामदे में बैठे बच्चों की आंखों में उत्सुकता थी। वे जानना चाहते थे कि जीवन, स्वतंत्रता और अधिकार जैसे शब्द आखिर उनके लिए क्या मायने रखते हैं। विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार की टीम जब स्कूल पहुंची तो बच्चों और लोगों के मन में जागरूकता की एक नई रोशनी जगाने की प्रयास की।
बच्चों से सीधा संवाद, जिसने उनके मन में सवाल जगाए
LADC डिप्टी चीफ नित्यानंद दुबे बच्चों के बीच उस अंदाज में बैठे, जैसे कोई बड़ा अपने घर के बच्चों को समझा रहा हो। उन्होंने सरल उदाहरणों के साथ बताया कि मानवाधिकार सिर्फ किताबों के शब्द नहीं हैं, बल्कि हर इंसान के जीवन की बुनियाद हैं। बातचीत आगे बढ़ी तो कई बच्चे अपने सवालों के साथ खड़े हो गए। किसी ने पूछा कि गलत मामले में फंसने पर क्या करना चाहिए, किसी ने जानना चाहा कि स्कूल में होने वाली बदसलूकी भी अधिकारों से जुड़ती है या नहीं। नित्यानंद दुबे ने हर सवाल को धैर्य से सुना और बच्चों के चेहरे पर संतोष की मुस्कान लौटाई।
मुफ्त कानूनी सहायता की जानकारी ने कई छात्रों को दी राहत
कार्यक्रम में LADC विजय कुमार ने बच्चों को बताया कि यदि कभी जरूरत पड़े तो NALSA और JHALSA किस तरह मुफ्त कानूनी सहायता देते हैं। कुछ छात्र चुपचाप सुन रहे थे, लेकिन उनकी आंखों में एक राहत दिख रही थी, जैसे उन्हें पता चला हो कि मुश्किल समय में कोई संस्था उनकी मदद के लिए मौजूद है।

स्कूल से अस्पताल तक पहुंचा जागरूकता का संदेश
इसी दिन डुमरिया उच्च विद्यालय में भी LADC प्रवीन्द कुमार साहू ने बच्चों से बात की और उन्हें समझाया कि मानवाधिकार सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं होते, बल्कि हर गांव, हर घर और हर स्कूल के लिए जरूरी हैं। गाढ़वा अस्पताल में डिप्टी चीफ अनिता रंजन ने मरीजों और परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने उन लोगों से बात की, जो बीमारी और कठिनाइयों से जूझ रहे थे। उन्हें बताया गया कि इलाज, सुरक्षा और सम्मान भी उनके अधिकार हैं।
एक दिन, जिसने कई दिमागों में जलाई जागरूकता की लौ
झालसा रांची के निर्देश और प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकार गढ़वा मनोज प्रसाद के आदेश पर आयोजित इस कार्यक्रम में सिर्फ जानकारी बांटने का काम नहीं था। यहां एहसास दिलाने का प्रयास था कि अधिकारों की समझ इंसान को मजबूत बनाती है। गढ़वा में आयोजित ये कार्यक्रम उन बच्चों, मरीजों और ग्रामीणों के लिए था जिन्हें शायद पहली बार समझ आया कि अधिकारों की बात केवल किताबों की भाषा नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन की कहानी का हिस्सा है।
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