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Godda : टीबी की दवा समय पर मिल जाती है, लेकिन पेट भरने और शरीर को ताकत देने वाला खाना हर किसी के हिस्से में नहीं आता। सुंदरपहाड़ी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला, जब इलाज करा रहे 86 टीबी मरीजों को फूड बास्केट दी गई। यह पहल जितपुर खनन परियोजना की सीएसआर गतिविधि के तहत की गई। लेकिन यह सिर्फ राशन बांटने का कार्यक्रम नहीं था… यह उन लोगों के चेहरे पर लौटी उम्मीद की कहानी थी, जो बीमारी के साथ-साथ गरीबी से भी लड़ रहे हैं।
कमजोरी से जूझती ज़िंदगी
सुंदरपहाड़ी के एक 52 वर्षीय मरीज (नाम न छापने की शर्त पर) ने धीमी आवाज में कहा, “दवा तो अस्पताल से मिल जाती है, पर घर में कभी-कभी दाल भी नसीब नहीं होती। शरीर कमजोर हो जाता है… काम भी नहीं कर पाते।” टीबी का इलाज लंबा चलता है। छह महीने से लेकर उससे ज्यादा समय तक नियमित दवा लेनी पड़ती है। इस दौरान मरीजों को प्रोटीन और पोषक तत्वों से भरपूर आहार की जरूरत होती है। लेकिन जिन परिवारों की रोजी-रोटी दिहाड़ी मजदूरी पर टिकी हो, वहां पौष्टिक भोजन जुटाना आसान नहीं। ऐसे में जब मरीजों को दाल, चावल, खाद्य तेल, फल और अन्य जरूरी सामान से भरी टोकरी मिली, तो कई आंखों में राहत साफ दिखी।

“पोषण होगा तो दवा असर करेगी”
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों का कहना है कि टीबी के इलाज में दवा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है संतुलित आहार।
एक स्वास्थ्यकर्मी ने बताया, “कई बार मरीज दवा तो लेते हैं, लेकिन शरीर में ताकत नहीं होने के कारण रिकवरी धीमी हो जाती है। अगर नियमित पोषण मिले, तो परिणाम बेहतर आते हैं।” राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान का लक्ष्य तभी पूरा होगा, जब दवा के साथ पोषण और जागरूकता दोनों पर बराबर ध्यान दिया जाए।
सीएसआर से सामाजिक जिम्मेदारी तक
कार्यक्रम के दौरान कंपनी के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह पहल सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
उनका कहना था, “हम चाहते हैं कि मरीज सिर्फ दवा पर निर्भर न रहें, बल्कि सही खान-पान से जल्दी स्वस्थ हों। समाज के कमजोर वर्गों तक मदद पहुंचाना हमारी प्राथमिकता है।” उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि आगे भी स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यक्रम जारी रहेंगे।
एक छोटी टोकरी, बड़ा सहारा
फूड बास्केट लेते समय एक महिला मरीज ने कहा, “अब बच्चों को भी थोड़ा अच्छा खाना दे पाएंगे। दवा से जी तो बच जाएगा, पर ताकत भी जरूरी है।” इन शब्दों में सिर्फ आभार नहीं, बल्कि संघर्ष की कहानी भी छिपी थी। टीबी केवल फेफड़ों की बीमारी नहीं, यह सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से भी जुड़ी है। बीमारी के कारण काम रुकता है, आमदनी घटती है और परिवार पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में यह छोटी-सी मदद मरीजों को यह एहसास दिलाती है कि वे अकेले नहीं हैं।
प्रशासन और कंपनी की मौजूदगी
कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग की ओर से डॉ. आकाश और जिला समन्वयक दीपक कुमार मौजूद रहे। टेरी माइनिंग कंपनी की ओर से प्रदीप अग्रवाल, सदानंद सिंह, संतोष कुमार, जितेंद्र कुमार, आयनदीप और सतीश चंद्र भी उपस्थित थे। सभी ने मरीजों से नियमित दवा लेने, साफ-सफाई रखने और संतुलित आहार अपनाने की अपील की। 86 फूड बास्केट शायद आंकड़ों में एक संख्या हो, लेकिन उन 86 परिवारों के लिए यह नई ताकत, नया भरोसा और बेहतर कल की उम्मीद है।
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