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Ranchi : रांची के कांके रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास में बुधवार की दोपहर का माहौल सामान्य नहीं था। दरवाजे पर सन्नाटा था, भीतर भावनाओं का ज्वार। मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के सामने बैठे दो परिवार — पलामू के शहीद आरक्षी सुनील कुमार राम और संतन कुमार मेहता के परिजन। आंखों में गर्व था, पर आंसू रुक नहीं रहे थे।
मुख्यमंत्री ने उनके हाथों में 1 करोड़ 10 लाख रुपये की सहायता राशि का चेक सौंपा। यह सिर्फ आर्थिक मदद नहीं थी, बल्कि उस बलिदान का सम्मान था, जो इन दोनों जवानों ने राज्य की सुरक्षा के लिए दिया था।
मुख्यमंत्री ने परिजनों से हाथ जोड़कर कहा — “आपके बेटे ने न सिर्फ अपने परिवार का, बल्कि पूरे झारखंड का सिर ऊंचा किया है। राज्य आपकी पीड़ा को समझता है, हम हमेशा आपके साथ खड़े हैं।”
शहीद सुनील कुमार राम की मां की आंखों से आंसू ढुलक पड़े। उन्होंने कहा — “बेटा तो चला गया, लेकिन आज लगा कि सरकार ने उसे भूला नहीं। ये पैसे नहीं, हमारे बेटे की पहचान का सम्मान है।”
मुख्यमंत्री ने बच्चों से भी बात की। उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले — “तुम्हें अच्छी शिक्षा मिलेगी, यही तुम्हारे पिता की सच्ची विरासत होगी।”
उन्होंने घोषणा की कि राज्य सरकार रांची में शहीद जवानों के बच्चों के लिए एक विशेष आवासीय विद्यालय बनाएगी, जहां उन्हें निजी स्कूलों जैसी गुणवत्तापूर्ण नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी। इसके लिए चार एकड़ भूमि झारखंड जगुआर परिसर में चिन्हित की जा चुकी है।
मुख्यमंत्री ने कहा — “राज्य सरकार अब एक ऐसा स्कूल बनाएगी जहां से देश के भविष्य के रक्षक निकलेंगे — ठीक वैसे ही जैसे आपके पिता ने अपनी जान देकर इस धरती की रक्षा की।”
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि पुलिस परिवारों के स्वास्थ्य के लिए एक विशेष अस्पताल की योजना पर भी काम शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा कि हमारा कर्तव्य सिर्फ वर्दी वालों तक नहीं, बल्कि उनके परिवारों तक भी है।
इस मौके पर वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर, डीजीपी अनुराग गुप्ता, पलामू एसपी रिष्मा रमेशन और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। अधिकारियों ने बताया कि दोनों शहीद आरक्षियों की पत्नियों को क्लर्क की नौकरी दी जाएगी और पेंशन समेत सभी लाभ शीघ्र दिए जाएंगे।
मुख्यमंत्री ने जाते-जाते परिजनों से कहा — “हिम्मत रखिए, यही आपके शहीद बेटे की ताकत थी। सरकार आपके साथ है — हर जरूरत में, हर मुश्किल में।”
उस क्षण, कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। शायद इसलिए नहीं कि किसी ने खोया है, बल्कि इसलिए कि झारखंड ने अपने दो सपूतों को सच्चे अर्थों में ‘अमर’ कर दिया था। इस पहल ने न सिर्फ दो परिवारों का दर्द बांटा, बल्कि यह संदेश भी दिया कि राज्य अपने शहीदों को भूलता नहीं। उनकी शहादत सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा का हिस्सा बन चुकी है।
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