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Garhwa (Nityanand Dubey) : गढ़वा के भीड़भाड़ वाले बाजारों में रोज जूते-चप्पल बेचने वाले दुकानदारों की दुनिया बाहर से जितनी साधारण दिखती है, उतनी होती नहीं है। दिन भर दुकान पर खड़े रहना, ग्राहकों की पसंद–नापसंद समझना, और फिर बाजार की चुनौतियों से जूझना, इन सबके बीच उन्हें किसी ऐसे मंच की जरूरत थी जहां वे अपनी बात बिना झिझक रख सकें। इस हफ्ते जब ‘कॉफी विद एसडीएम’ कार्यक्रम में फुटवियर कारोबारियों को बुलाया गया, तो जैसे उन्हें अपनी रोजमर्रा की उलझनों को किसी भरोसेमंद शख्स के सामने रखने का मौका मिला।
जब बाजार की भीड़ एक बोझ बन जाती है
कई दुकानदारों ने बताया कि फुटपाथ पर लगातार बढ़ता अतिक्रमण और संकरी गलियों में भीड़ का दबाव कारोबार को मुश्किल बनाता है। एक दुकानदार ने कहा, “ग्राहक दुकान तक पहुंच ही नहीं पाते। भीड़ के कारण वापस लौट जाते हैं। रोज का काम प्रभावित होता है।”
ये सिर्फ शिकायतें नहीं थीं, बल्कि उन छोटे व्यापारियों की बेबसी थी, जिनके परिवार उसी दुकान पर निर्भर हैं।
एसडीएम ने सुनी बातें, समझा तनाव
सदर एसडीएम संजय कुमार ने हर एक कारोबारी की बात न केवल सुनी, बल्कि उनके पीछे छिपी चिंता को भी समझा। उन्होंने कहा कि प्रशासन की मंशा बाजार में ऐसा माहौल बनाने की है जिसमें न व्यापार रुके, न आम लोगों को परेशानी हो। बैठक के दौरान सफाई व्यवस्था, पार्किंग, सुरक्षा और लाइसेंसिंग जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। समाधान के रास्ते तलाशने की कोशिश दिख रही थी।
जब कारोबारियों ने दिखाया दिल का आकार
कार्यक्रम का सबसे भावुक पल तब आया जब ट्रेडर्स ने प्रशासन की पहल “आइये खुशियां बांटें” का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि वे जरूरतमंद लोगों तक जूते-चप्पल पहुंचाकर इस अभियान में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। उनकी यह इच्छा बताती है कि व्यापार सिर्फ कमाई का साधन नहीं, बल्कि समाज से जुड़कर चलने की जिम्मेदारी भी है।
हर दुकान के पीछे एक कहानी
बैठक में शामिल जामिया फुटवियर के मोहम्मद मिशब उल हक हों, गरीब नवाज शू स्टोर के मोहम्मद इरफान हों, या फिर युवा उद्यमी मोहम्मद अरमान हर किसी के पास अपनी अलग कहानी थी। किसी ने बदहाल बाजार व्यवस्था से लड़ाई बताई, किसी ने ग्राहक कम होने का दर्द। लेकिन सभी के चेहरे पर उम्मीद थी कि शायद आज कही गई बातें बदलाव की शुरुआत बनें।
संवाद की ताकत
कार्यक्रम के अंत में एसडीएम ने व्यापारियों का धन्यवाद किया और कहा कि प्रशासन और व्यापारी मिलकर ही एक बेहतर शहर की तस्वीर बना सकते हैं। उस एक कमरे में मौजूद हर शख्स ने महसूस किया कि संवाद सिर्फ बातें नहीं बदलता, हालात भी बदल सकता है।
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