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Ranchi : डोरंडा का न्याय सदन यानी झालसा सभागार शनिवार की सुबह रोज की तरह कानूनी बहसों और मुकदमों की फाइलों से इतर, एक अलग ही रंग में रंगा था। मौका था झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला का। लेकिन यह कार्यशाला किसी अदालती प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि एक ऐसे विषय पर थी जिसे अक्सर कोर्ट-कचहरी के गलियारों में नेपथ्य में धकेल दिया जाता है… वह है ‘वित्तीय प्रबंधन’ यानी पैसों का सही और पारदर्शी हिसाब-किताब। न्याय के पहिए को सुचारू रूप से चलाने के लिए सिर्फ कानून की समझ ही नहीं, बल्कि ‘बजट और बैलेंस शीट’ की बारीकियां भी उतनी ही जरूरी हैं, इसी सोच के साथ इस अनूठे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी।
न्याय का आधार है साफ-सुथरा हिसाब : न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद
सुबह करीब 10:30 बजे मुख्य अतिथि झारखंड हाई कोर्ट के न्यायाधीश और झालसा के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद, और विशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने दीप जलाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। कार्यशाला का मुख्य आकर्षण न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद का संबोधन रहा, जिन्होंने बेहद व्यावहारिक अंदाज में वित्तीय कौशल की अहमियत समझाई। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्था की तरक्की और उस पर जनता का भरोसा इस बात से तय होता है कि उसका वित्तीय प्रबंधन कितना पारदर्शी, जवाबदेह और नियमसंगत है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद ने कहा कि DLSA यानी जिला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ हैं। बजट बनाने से लेकर फंड के सही इस्तेमाल और समय पर यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट भेजने की बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। उन्होंने एक गुरु की तरह नसीहत देते हुए कहा कि बिना पूर्व अनुमति के कभी भी एक मद के पैसे को दूसरे काम में न लगाया जाए और हर खर्च का पक्का बिल-वाउचर संभालकर रखा जाए।

जमीन पर काम करने वालों की सुध, मानदेय पर विशेष जोर
न्याय के इस मंच से न्यायमूर्ति प्रसाद ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दा उठाया… पैरा लीगल वॉलंटियर्स (पीएलवी) और मध्यस्थों (मीडिएटर्स) के मानदेय का। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो लोग जमीन पर उतरकर कानूनी सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं, उनके मानदेय का भुगतान समय पर होना चाहिए। जब उन्हें वक्त पर पैसा मिलेगा, तो उनका हौसला बढ़ेगा और वे ज्यादा समर्पण के साथ समाज के लिए काम कर पाएंगे। उन्होंने सचिवों से कहा कि वे इस कार्यशाला को महज एकतरफा भाषण न समझें, बल्कि खुलकर विशेषज्ञों से अपनी शंकाएं दूर करें।
कानून की पढ़ाई में जो छूटा, वह यहां सीखा : न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी
विशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने अपनी बात रखते हुए एक बहुत ही व्यावहारिक पहलू को छुआ। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि लॉ की पढ़ाई के दौरान हमें वित्तीय नियमों या मैनेजमेंट की ट्रेनिंग नहीं मिलती। लेकिन जब हम प्रशासनिक पदों पर आते हैं, तो यह ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकारी पैसे का इस्तेमाल करने वाली हर संस्था के लिए वित्तीय अनुशासन पहली शर्त है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह कार्यशाला सचिवों को पैसों के लेन-देन की व्यावहारिक समझ देगी।

जब तालियों से गूंज उठा सभागार, रील को मिला देश का बेस्ट अवॉर्ड
इस गंभीर चर्चा के बीच एक पल ऐसा भी आया जब पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मौका था खूंटी के बिरसा कॉलेज के छात्रों के सम्मान का। इन छात्रों द्वारा बनाई गई एक रील को राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) की ओर से पूरे भारतवर्ष में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिला था। इसके साथ ही झालसा की अप्रैल से जून 2026 की तिमाही न्यूजलेटर का भी विमोचन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना के स्वागत भाषण से हुई और समापन उप सचिव श्री अभिषेक कुमार के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
तीन सत्र, डिजिटल टूल्स और एक्सपर्ट्स की क्लास
उद्घाटन सत्र के बाद शुरू हुई असली पाठशाला। कार्यशाला को तीन तकनीकी सत्रों में बांटा गया था, जो पूरी तरह से व्यावहारिक थे। इसमें केवल थ्योरी नहीं, बल्कि रोजमर्रा के काम आने वाले टूल्स पर बात हुई।
- अकाउंट्स का रखरखाव : रजिस्टर और अकाउंट बुक्स को बिना गलती के कैसे मेंटेन करें।
- डिजिटल गवर्नेंस : पीएफएमएस (PFMS) मॉड्यूल और जीईएम (GeM) पोर्टल का प्रभावी इस्तेमाल कैसे हो, ताकि सरकारी खरीद में पूरी पारदर्शिता रहे।
- समीक्षा : पिछले छह महीनों में झारखंड के सभी डीएलएसए के कामकाज का लेखा-जोखा।
इन विषयों पर ट्रेनिंग देने के लिए पूर्व वरिष्ठ डीएजी फैजान अहमद और अजय कुमार, GeM सलाहकार कुणाल चौरसिया सहित कई वरिष्ठ तकनीकी और लेखा अधिकारी मौजूद थे। कार्यशाला का आखिरी सत्र झालसा की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
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