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Ranchi (Pawan Thakur) : 8 सितंबर की दोपहर रांची के नामकुम स्थित मौलाना आजाद कॉलोनी के एक घर में रोज की तरह ही शुरू हुई थी। किसी बात पर बात बिगड़ी, घर के बड़े ने किशोर बेटे को डांट दिया। डांट तो हर घर में पड़ती है, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे इलाके की धड़कनें बढ़ा दीं। 16 साल का वह लड़का बिना कुछ कहे, बिना किसी को बताए घर की दहलीज लांघ गया। अगले तीन दिनों तक मां की आंखें चौखट पर टिकी रहीं और पिता रेलवे ट्रैक से लेकर परिचितों के घर तक खाक छानते रहे। 11 सितंबर को जब रांची पुलिस ने उस बच्चे को धनबाद-गिरिडीह रूट की एक ट्रेन से सकुशल बरामद कर परिवार की गोद में सौंपा, तब जाकर मोहल्ले ने चैन की सांस ली। यह कहानी सिर्फ एक बच्चे के मिलने की नहीं है, बल्कि उस दरकते पारिवारिक संवाद की है जो आज हर दूसरे घर की सच्चाई बन चुका है।
वो कोना जो अब आंसुओं के लिए छोटा पड़ गया
बच्चे की सुरक्षित वापसी पर झारखंड प्रदेश जमीयतुल कुरैश ने पुलिस के सम्मान में एक सादा समारोह रखा था। वहां पहुंचे डीएसपी (मुख्यालय प्रथम) अमर पांडेय ने जब माइक थामा, तो वे किसी सख्त पुलिस अफसर की तरह नहीं, बल्कि एक फिक्रमंद अभिभावक की तरह बोले। उन्होंने पुराने दिनों को कुरेदते हुए कहा कि पहले जब घर में किसी बात पर पिटाई या डांट पड़ती थी, तो बच्चे घर के किसी कोने में मुंह फुलाकर बैठ जाते थे। ज्यादा गुस्सा आया तो नानी-दादी या बगल वाले चाचा के घर जाकर बैठ गए। मगर मोहल्ला छूटता नहीं था, गांव की सरहद पार करने का ख्याल भी मन में नहीं आता था।

आज तस्वीर बदल चुकी है। आज के बच्चे डांट सुनते ही ट्रेन पकड़ ले रहे हैं। डीएसपी का सीधा इशारा उस स्क्रीन की तरफ था, जिसने हमारे घरों के भीतर ही मीलों की दूरियां पैदा कर दी हैं। आज माता-पिता अपनी भागदौड़ में इतने उलझे हैं कि बच्चों के हिस्से का वक्त दफ्तर या मोबाइल की फाइलों में चला जाता है। उधर बच्चे हाथ में स्मार्टफोन लिए ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया की उस मायावी दुनिया में खोए हैं, जहां भावनाएं बहुत नाजुक और सब्र बेहद कम हो चुका है। जरा सी डांट उन्हें बर्दाश्त नहीं होती और वे सीधे घर से भागने का रास्ता चुन लेते हैं।
जब डिजिटल सुराग और सामाजिक एकजुटता ने बचाई जिंदगी
इस पूरे घटनाक्रम में राहत की बात यह रही कि बच्चे के गायब होते ही परिजनों ने थाने में औपचारिक लिखा-पढ़ी से पहले ही सोशल साइट्स पर उसकी तस्वीर और हुलिया साझा कर दिया। नामकुम थाने के जांच अधिकारी एएसआई टीपी केसरी और उनकी टीम ने उसी डिजिटल सुराग को पकड़ा और लगातार मॉनिटरिंग करते हुए आखिरकार चौथे दिन बच्चे को ट्रेन की बोगी से सुरक्षित निकाल लिया।
सभा में एएसआई टीपी केसरी ने भी एक बहुत जमीनी बात कही। उन्होंने कहा कि गलती सिर्फ बच्चों की नहीं होती, मां-बाप को भी यह देखना होगा कि वे बच्चे को क्या दे रहे हैं। जो बच्चे अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखते, उन्हें शांत कराने के लिए उनके हाथों में मोबाइल थमा दिया जाता है। बच्चे को स्क्रीन नहीं, शाम के वक्त मैदान की मिट्टी चाहिए, खेलकूद चाहिए। साथ ही बच्चों को भी यह समझना होगा कि उनके मां-बाप किन हालात और संघर्षों से जूझकर उनका पालन-पोषण कर रहे हैं। वार्ड 11 की पार्षद आलिया नाज ने भी उस डर को याद किया जो चार दिनों तक पूरे मोहल्ले पर छाया रहा था।
नशे की काली छाया और संभलने की आखिरी घंटी
यह कार्यक्रम केवल बधाई देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने मौलाना आजाद कॉलोनी और आसपास की बस्तियों के उस कड़वे सच पर भी उंगली रखी जिसे लोग अक्सर दबा जाते हैं। डीएसपी अमर पांडेय ने चेताया कि इसी इलाके में हाल के दिनों में नशे की वजह से दो नौजवानों ने जान दी और गोलियां तक चलीं। नशा अब किसी एक तबके या अनपढ़ों की बीमारी नहीं रहा, बल्कि यह अच्छे-खासे परिवारों और पढ़ने वाले छात्रों की रगों में भी उतर रहा है। हर अपराध, हर अड्डेबाजी और घरेलू झगड़े की जड़ यही नशा है। पुलिस कानून का डंडा चला सकती है, लेकिन जब तक परिवार अपने बच्चों की अजीब हरकतों, उनकी सोहबत और अचानक बदले मिजाज पर नजर नहीं रखेगा, तब तक यह दीमक समाज को खोखला करता रहेगा।
झारखंड आंदोलनकारी और जमीयतुल कुरैश के अध्यक्ष मुजीब कुरैशी ने याद दिलाया कि वे बीते कई सालों से इस इलाके में नशे के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं, लेकिन अब वक्त आ गया है कि हर घर का मुखिया खुद अपने दरवाजे पर पहरेदार बने। परवेज कुरैशी के संचालन और झारखंड पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष महताब आलम के धन्यवाद के साथ जब यह महफिल खत्म हुई, तो लोगों के हाथ में सिर्फ पुलिस को दिए गए फूलों के गुलदस्ते नहीं थे, बल्कि जेहन में एक बड़ा सवाल था कि आज रात जब वे घर लौटेंगे, तो अपने बच्चे से मोबाइल छीनेंगे या उसे अपने सीने से लगाकर उसका हाल पूछेंगे।
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