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Home » “दो साल का दर्द… दो घंटे में राहत”… शमशेर आलम बने मजबूर का सहारा
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“दो साल का दर्द… दो घंटे में राहत”… शमशेर आलम बने मजबूर का सहारा

September 12, 2025No Comments2 Mins Read
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शमशेर आलम
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अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :

Ranchi : बरहरवा रेलवे स्टेशन का वो दिन साहिबगंज के जामुन दास की जिंदगी पर ऐसा पहाड़ टूटकर आया, जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे। दो साल पहले हुए हादसे में उनके बेटे ने अपने दोनों पांव खो दिए। उस दिन से लेकर अब तक जामुन दास ने हर सरकारी दफ्तर का दरवाज़ा खटखटाया, हर अधिकारी से गुहार लगाई, लेकिन हर जगह से निराशा ही हाथ लगी। दो साल से पिता अपने बेटे को आर्टिफिशियल पांव लगवाने की आस में भटक रहे थे। बेटे की मासूम आंखों में उम्मीद और अपने मजबूर हालात से लड़ने की पीड़ा, दोनों ने जामुन दास को तोड़कर रख दिया था। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी जिंदगी में एक उम्मीद की किरण सबकुछ बदल देती है। साहिबगंज में कांग्रेस संगठन सृजन अभियान के तहत आए अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष और कांग्रेसी नेता शमशेर आलम से जब जामुन दास मिले, तो उनकी टूटी हुई आवाज़ ने सबका दिल छू लिया।

जामुन दास ने अपने बेटे की कहानी सुनाई… “दो साल से अपने बेटे को लेकर दर-दर भटक रहा हूं, लेकिन कोई मेरी सुनने वाला नहीं।” बस इतना सुनना था कि शमशेर आलम तुरंत हरकत में आ गए। उन्होंने झारखंड सरकार के संबंधित विभाग को पत्र लिखकर कहा कि 24 घंटे के भीतर आर्टिफिशियल पांव, व्हीलचेयर और बाकी जरूरी सामान उपलब्ध कराए जाएं। उनके कहने का असर यह हुआ कि जब जामुन दास अपने बेटे को लेकर रांची पहुंचे, तो महज 2 घंटे में उन्हें सारी जरूरी चीजें मिल गईं।

उस पल जामुन दास की आंखों से आंसू बह निकले। आंसुओं में दर्द भी था और कृतज्ञता भी। उन्होंने कहा… “शमशेर आलम मेरे बेटे के लिए फरिश्ता साबित हुए। जहां सरकार और दफ्तरों ने मुंह मोड़ा, वहीं उन्होंने हमें नई उम्मीद दी। दो साल से टूटी उम्मीदें महज कुछ घंटों में संवर गईं।”

इसे भी पढ़ें : राजधानी में भोरे-भोर एक्सी’डेंट : छात्रा की मौ’त ऑन द स्पॉट

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