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Ranchi : रांची की व्यवहार न्यायालय स्थित मध्यस्थता केंद्र, तारीख 13 सितंबर 2025… सामान्य दिनों की तरह यहां भीड़ थी, वाद-विवाद थे, कागज-पत्रों का अंबार था। लेकिन उस दिन का माहौल कुछ अलग था। यह दिन केवल कानूनी प्रक्रियाओं का नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्तों में जान फूंकने का दिन बना। यहां कानून के धपरंधरों ने रिश्तों की टूटती डोर को नयी ताकत देकर फिर से जोड़ दिया।
सुषमा और राजू के बीच की दीवारें ढही, रिश्ते जुड़े
कानूनी पन्नों पर दर्ज ओरिजिनल मेंटेनेंस वाद संख्या 385/2024 में सुषमा उरांव और राजू उरांव का मामला लंबे समय से लंबित था। जीवन की खटपट, तकरार और आपसी गलतफहमियों ने इन दोनों को अलग कर दिया था। दोनों के रिश्तों के बीच कड़वाहट की दीवार खड़ी हो गयी थी। लेकिन अधिवक्ता तमन्ना की पहल और अथक प्रयासों से दोनों के बीच की दीवारें ढह गईं। फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज सैयद सलीम फातमी के न्यायालय में लंबित यह वाद आखिरकार मध्यस्थता केंद्र में सुलह के साथ खत्म हुआ। दोनों पक्षों ने एक बार फिर साथ रहने का संकल्प लिया।
बच्चों की भविष्य की खातिर फिर हुए एक
वहीं, ओ.एम. 142/2025 भरण-पोषण वाद में भी एक और परिवार को नया जीवन मिला। सालों से अलग रह रहे पति-पत्नी अपने दो बच्चों की भविष्य के खातिर फिर से एक साथ आए। यहां अधिवक्ता मध्यस्थ मनीषा रानी और दोनों पक्षों के वकीलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पति ने साफ कहा कि अब वह अपनी पत्नी और बच्चों की हर जरूरत का ख्याल रखेंगे।
रिश्तों को बचाना ही सबसे बड़ी जीत : डालसा सचिव रवि भास्कर
इस भावुक क्षण में डालसा सचिव रवि कुमार भास्कर ने दोनों परिवारों को बधाई दी और छोटी-छोटी बातों पर विवाद से बचने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि परिवार और बच्चों की खातिर रिश्तों को बचाना ही सबसे बड़ी जीत है। संवाद और समझौते की गुंजाइश हो तो टूटे रिश्तों को भी जोड़ा जा सकता है। राष्ट्रीय लोक अदालत न केवल न्याय की प्रक्रिया को सरल बनाती है, बल्कि समाज में भरोसा और रिश्तों में गर्माहट भी लौटाती है।
टूटे दिलों और बिखरे घरों को जोड़ने की ताकत रखता है लोक अदालत
लोक अदालत को अक्सर लोग सिर्फ विवाद और लफड़े निपटाने का मंच मानते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है। यह मंच टूटे हुए दिलों और बिखरे हुए घरों को जोड़ने की ताकत भी रखता है। अदालत की सख्त कार्यवाही से इतर, मध्यस्थता की गर्मजोशी और संवाद की नरमी ने दो परिवारों को फिर से जोड़ा। जहां कानून अक्सर ‘जीत-हार’ तय करता है, वहीं लोक अदालत ने इस बार “दोनों की जीत” लिखी। रांची के लोक अदालत में सिर्फ कानूनी जीत नहीं हुई, बल्कि यहां बच्चों की मुस्कान, एक औरत का आत्मसम्मान और एक मर्द की जिम्मेदारी का पुनर्जन्म हुआ है।
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