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Chaibasa : 9-10 अक्टूबर की रात। शांत पहाड़ियों के बीच अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। नक्सलियों ने पुलिया को उड़ा दिया था। संदेश साफ था कि ‘इलाके में सरकार का नहीं, उनका राज चलेगा’। पुलिस ने छोटानागरा थाना कांड संख्या 21/2025 दर्ज कर जांच शुरू की। मगर, इस बार माओवादियों की चाल उसी जमीन पर उलट गई, जहां उन्होंने बारूद बिछाया था।
जंगल से निकले दो नाम – रेंगो और रापा
सघन अभियान के बीच पुलिस, कोबरा, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम ने दो चेहरों को बेनकाब किया… 19 साल का अलब्रेट लोमगा उर्फ रेंगो और 20 साल का विकास लोमगा उर्फ रापा लोमगा। दोनों अब पुलिस की गिरफ्त में हैं। दोनों के पास से विस्फोटक, 22 बैटरियां और 200 मीटर तार बरामद हुए। यही वो सामान था जिससे पुलिया के नीचे मौत बिछाई जानी थी। पुलिस की तफ्तीश में सामने आया कि दोनों युवक भा.क.पा. (माओवादी) के स्थानीय दस्ते से जुड़े थे। उम्र छोटी थी, पर हाथों में हथियार था और सपनों में आतंक का वह जाल, जिसे अब खौफ और पछतावे ने तोड़ दिया है।
सुरक्षाबलों का शिकंजा और नक्सलियों की बैचैनी
डीजीपी अनुराग गुप्ता के नेतृत्व में चल रहे अभियान ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है। कोल्हान-सारंडा के जंगलों में अब भी मिसिर बेसरा, अनमोल, मोछू, अनल और असीम मंडल जैसे शीर्ष नक्सली नेता सक्रिय हैं, मगर इस गिरफ्तारी ने उनके नेटवर्क को हिला दिया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इन दोनों की गिरफ्तारी से कई गुप्त ठिकानों की जानकारी मिली है। आगे और बड़ी कार्रवाई तय है।
बंदूक की राह या लौटती ज़िंदगी?
हर गिरफ्तारी के पीछे एक कहानी होती है… कभी मजबूरी की, कभी बहकावे की। शायद रेंगो और रापा भी उसी रास्ते भटके थे, जहां जंगलों की राजनीति और बंदूक की चमक ने उन्हें घेर लिया। पुलिस अब नक्सलियों को चेतावनी नहीं, मौका दे रही है… झारखंड सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा में लौटने का। डीजीपी अनुराग गुप्ता का सख्त लेकिन उम्मीद भरा संदेश गूंजता है… “राज्य से माओवादी गतिविधियों का पूर्ण उन्मूलन होगा। लेकिन जो लौटना चाहते हैं, उनके लिए दरवाज़े खुले हैं।”
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