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Pakur (Jaydev Kumar) : कभी ब्लैकबोर्ड और कॉपियों की दुनिया में सिमटी पढ़ाई अब स्क्रीन और पासवर्ड तक पहुंच चुकी है। आज बच्चे जितना समय किताबों के साथ बिताते हैं, उतना ही मोबाइल या इंटरनेट पर भी। लेकिन इसी दुनिया में एक सच्चाई ये भी है… हर क्लिक के पीछे एक खतरा छिपा है। इसी खतरे से बच्चों को बचाने के लिए दिल्ली पब्लिक स्कूल, पाकुड़ में एक अलग तरह की पहल की गई… एक ऐसी कार्यशाला, जिसने बच्चों को सिर्फ “पढ़ाई” नहीं बल्कि “सुरक्षा” का पाठ भी पढ़ाया।
‘कनेक्टेड, प्रोटेक्टेड और एम्पॉवर्ड’ का संदेश
6 नवंबर को स्कूल प्रांगण में जब दीप जले तो माहौल किसी त्योहार से कम नहीं था। मंच पर शिक्षक थे, सामने बच्चे, और बीच में एक सवाल… “हम ऑनलाइन सुरक्षित कैसे रहें?” प्रधानाचार्य जेके शर्मा ने बच्चों से सीधे कहा, “डिजिटल युग में समझदारी ही आपकी सबसे बड़ी सुरक्षा है।” उन्होंने समझाया कि इंटरनेट की दुनिया जितनी सुविधाजनक है, उतनी ही संवेदनशील भी। इस साल का विषय ‘Connected, Protected and Empowered’ इसी बात को सिखाता है कि तकनीक का उपयोग सीखने के लिए हो, डर फैलाने के लिए नहीं।
डर की जगह जागरूकता जरूरी
विद्यालय के निदेशक अरुणेंद्र कुमार का संदेश सादा लेकिन असरदार था… “डिजिटल युग में हिंसा और धमकी से बच्चों को बचाना अब विकल्प नहीं, जिम्मेदारी है।” उन्होंने कहा कि बच्चों को तकनीक का इस्तेमाल सिखाने के साथ-साथ उसमें छिपे खतरे पहचानना भी जरूरी है। उन्होंने साफ कहा, “स्कूल में किसी डर या धमकी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यहां सिर्फ सीखने और आगे बढ़ने की बात होगी।”
वीडियो और कहानियों के जरिए सीख
कार्यक्रम का सबसे जीवंत हिस्सा तब आया जब समन्वयक और कंप्यूटर शिक्षक सौरिश दत्ता ने बच्चों को साइबर बुलिंग पर छोटे वीडियो दिखाए। हर वीडियो में एक कहानी थी… कोई बच्चा नकली प्रोफाइल से परेशान था, कोई फर्जी लिंक पर क्लिक कर बैठा था। बच्चे हर दृश्य के साथ चुपचाप सोचते रहे, शायद किसी न किसी रूप में ये सब उनके आस-पास भी होता है। सौरिश दत्ता ने बताया कि नकली आईडी कैसे पहचानी जाए, और ऑनलाइन “अजनबी दोस्ती” के पीछे छिपे खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
एआई के युग में सुरक्षा का सबक
एआई शिक्षक उज्जवल कुमार ने बच्चों से पूछा… “क्या आप जानते हैं कि पासवर्ड किसी को बताना भी एक गलती है?” फिर उन्होंने बताया कि आजकल एआई तकनीक की मदद से पहचान चुराना या गलत उपयोग करना आसान हो गया है। उन्होंने बच्चों को मजबूत पासवर्ड बनाना, पहचान सुरक्षित रखना और ऑनलाइन किसी संदिग्ध संदेश पर सतर्क रहने के तरीके सिखाए।
जब बच्चों ने पूछे अपने सवाल
कार्यशाला का अंत एक खुले सत्र से हुआ। बच्चों ने बेहिचक अपने सवाल रखे… “अगर कोई हमें ऑनलाइन धमकाए तो क्या करें?”, “फेक वीडियो कैसे पहचानें?” सभी शिक्षकों ने एक-एक कर जवाब दिए। जवाब सिर्फ तकनीकी नहीं थे, भावनात्मक भी थे… “डरना नहीं, बताना है। बात करना ही पहला बचाव है।”
एक दिन जिसने बच्चों की सोच बदल दी
कार्यशाला खत्म होने के बाद बच्चों के चेहरों पर एक अलग आत्मविश्वास था। उन्होंने सिर्फ इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं सीखा, बल्कि इंटरनेट में ‘सुरक्षित रहना’ भी सीखा। डीपीएस पाकुड़ का यह आयोजन साबित करता है कि असली शिक्षा वही है जो बच्चों को हर परिस्थिति में समझदार और जागरूक बनाए।
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