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Pakur (Jaydev Kumar) : आज बच्चों का खेल का मैदान सिर्फ स्कूल की दीवारों तक सीमित नहीं रह गया है। उनकी दुनिया अब मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और इंटरनेट के अनजान गलियारों तक फैल चुकी है। ऐसे में एक छोटे से शहर पाकुड़ से उठी एक पहल ने अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनेस्को का ध्यान अपनी ओर खींचा और तारीफ भी बटोरी।
जब बच्चों की चिंता बनी प्रेरणा
दिल्ली पब्लिक स्कूल, पाकुड़ के शिक्षकों ने देखा कि तकनीक जितनी तेज़ी से बच्चों के हाथों में आ रही है, उतनी ही तेज़ी से साइबर जोखिम भी बढ़ रहा है। किसी बच्चे का सोशल मीडिया पासवर्ड हैक हो जाना, किसी को ऑनलाइन गेम्स में बुली किया जाना, किसी मासूम का अनजाने में गलत लिंक पर क्लिक कर देना, ये सब स्कूल के लिए चिंता बन चुके थे। इसी सोच से जन्म लिया एक पहल ने… “साइबर सुरक्षा और हिंसा के खिलाफ जागरूकता संगोष्ठी”।
यूनेस्को अधिकारी की आंखों में दिखा गर्व
इस प्रयास से प्रभावित होकर यूनेस्को के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय कार्यालय, नई दिल्ली की राष्ट्रीय कार्यक्रम अधिकारी डॉ. सरिता जाधव जब संगोष्ठी में पहुंचीं तो सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रहीं, बल्कि बच्चों की आंखों में डिजिटल भविष्य का भरोसा महसूस किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं DPS पाकुड़ की इस पहल की प्रशंसा करती हूं। यह कार्यक्रम बच्चों को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और उन्हें सुरक्षित भविष्य के लिए तैयार करेगा।”

रंगों में ढली डिजिटल सुरक्षा
संगोष्ठी का एक कोना बच्चों की बनाई पेंटिंग्स से सजा हुआ था। इन चित्रों में “Don’t share your password”, “Think before you click” और “Stop Cyber Bullying” जैसे संदेश रंगों की भाषा में उभर रहे थे। डॉ. जाधव कुछ देर तक एक-एक चित्र को देखती रहीं। उन्होंने कहा, “इन चित्रों में बच्चों की समझ और संवेदनशीलता दिखाई देती है। यह पहल न केवल शिक्षकों और बच्चों बल्कि समाज के लिए प्रेरक है।” उन्हें देखकर लग रहा था जैसे इन बच्चों ने कला के ज़रिए भविष्य के समाज के लिए एक चेतावनी-पत्र तैयार कर दिया हो।
स्कूल प्रबंधन की सोच – बच्चों को तकनीक नहीं, खुद को चलाना सीखाना है
विद्यालय के निदेशक अरुणेंद्र कुमार बताते हैं कि आज बच्चों को फोन से दूर रखना समाधान नहीं है, बल्कि उन्हें तकनीक का जिम्मेदार उपयोग सिखाना ज़रूरी है। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे साइबर अपराध से न डरें, बल्कि समझदारी से उसका सामना करना सीखें। बच्चों को उनके डिजिटल अधिकार जानना उतना ही ज़रूरी है, जितना संविधान की किताब पढ़ना।”
प्रधानाचार्य का संदेश- एक बच्चे की जागरूकता, एक परिवार की सुरक्षा
प्रधानाचार्य श्री जे.के. शर्मा की बात में एक सच्चाई छिपी थी, “अगर एक बच्चा साइबर सुरक्षा सीखेगा, तो वह अपने परिवार को भी सीखाएगा। और ऐसे ही एक सुरक्षित समाज बनेगा।” उन्होंने माना कि आज ऑनलाइन दुनिया बच्चों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में स्कूल का फर्ज़ सिर्फ किताबें पढ़ाना नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े जोखिमों से बचाव सिखाना भी है।
यह कहानी सिर्फ DPS पाकुड़ की नहीं, हर घर की है
साइबर सुरक्षा कोई तकनीकी विषय नहीं रहा, यह अब बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और भविष्य से जुड़ी गंभीर मानवीय ज़रूरत बन चुका है। और DPS पाकुड़ की यह पहल, यूनेस्को द्वारा सराहे जाने के बाद, कई अन्य स्कूलों के लिए एक दिशा बन सकती है। क्योंकि जब बच्चे सुरक्षित होंगे, तभी उनका सपनों वाला डिजिटल आसमान भी सुरक्षित होगा।
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