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Ranchi : रांची के झारखंड मंत्रालय में एक औपचारिक कार्यक्रम चल रहा था। मंच पर सीएम, अधिकारी और कैमरों की मौजूदगी थी, लेकिन असली फोकस किसी फाइल या भाषण पर नहीं, बल्कि उस आम इंसान पर था, जिसकी आवाज अक्सर बजट की मोटी किताबों में कहीं खो जाती है। सीएम हेमंत सोरेन ने जब अबुआ दिशोम बजट पोर्टल और मोबाइल ऐप का शुभारंभ किया, तो यह केवल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत नहीं थी। यह उस भरोसे की शुरुआत थी कि अब झारखंड का बजट सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि जनता भी मिलकर तय करेगी।
गांव का किसान और शहर की छात्रा, दोनों की बात
सोचिए राज्य के किसी सुदूर गांव में रहने वाले किसान को, जो अब तक बजट को सिर्फ अखबार की सुर्खियों में देखता था। या फिर शहर की उस छात्रा को, जो शिक्षा और रोजगार से जुड़ी अपनी चिंता सरकार तक पहुंचाना चाहती है। अबुआ दिशोम बजट पोर्टल ने इन दोनों को एक ही मंच पर ला खड़ा किया है। अब मोबाइल फोन के जरिए कोई भी व्यक्ति यह बता सकता है कि उसके इलाके में सड़क की जरूरत है, स्कूल में शिक्षक कम हैं या फिर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर कैसे किया जा सकता है।
सीएम की सोच, योजनाओं से आगे की बात
कार्यक्रम के दौरान सीएम ने साफ शब्दों में कहा कि मजबूत राज्य की नींव सिर्फ योजनाओं से नहीं बनती, बल्कि जनता की भागीदारी से बनती है। यही वजह है कि सरकार बजट को समावेशी बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। उनकी बातों में प्रशासनिक भाषा कम और आम लोगों से संवाद का भाव ज्यादा था। ऐसा लगा जैसे सरकार यह कह रही हो कि यह बजट हमारा नहीं, आपका है।
सुझाव देने की आखिरी तारीख और एक खास पहल
आम लोग 17 जनवरी 2026 तक अपने सुझाव पोर्टल, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स के माध्यम से भेज सकते हैं। खास बात यह है कि राजस्व बढ़ाने से जुड़े सुझावों को भी गंभीरता से लिया जाएगा, ताकि राज्य आर्थिक रूप से और मजबूत हो सके। सरकार ने यह भी घोषणा की है कि तीन सर्वश्रेष्ठ सुझाव देने वाले लोगों को सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान सिर्फ पुरस्कार नहीं, बल्कि उस नागरिक की पहचान है जिसने राज्य के भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई।
सुदूर इलाकों तक पहुंचेगी भागीदारी
सीएम ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सुझाव लेने की प्रक्रिया 15 नवंबर से ही शुरू कर दी जाए। इसका मकसद साफ है कि सिर्फ शहरों की नहीं, बल्कि जंगल, पहाड़ और दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों की आवाज भी बजट तक पहुंचे।
एक पहल, जो भरोसा जगाती है
अबुआ दिशोम बजट पोर्टल उस सोच का प्रतीक है, जिसमें सरकार और जनता के बीच दूरी कम होती है। यह पहल बताती है कि लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं, बल्कि फैसलों में हिस्सेदारी का नाम है।
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