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Ranchi : शनिवार की सुबह रांची सिविल कोर्ट परिसर कुछ अलग ही माहौल में नजर आया। यहां न तो किसी चर्चित मुकदमे की सुनवाई थी, न ही भीड़भाड़ वाला कोर्ट रूम। इसके बजाय 40 कोर्ट्स बिल्डिंग के कॉन्फ्रेंस हॉल में कानून की भाषा को मानवीय संवेदना से जोड़ने की कोशिश हो रही थी। पॉक्सो एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट पर आयोजित यह मल्टी स्टेकहोल्डर जागरूकता कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं था, बल्कि उन लोगों को आईना दिखाने का प्रयास था, जो किसी न किसी रूप में बच्चों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया से जुड़े हैं।
जब न्याय ने संवेदना से बात की
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई। मंच पर न्यायिक अधिकारी, अभियोजक और डालसा के प्रतिनिधि मौजूद थे। लेकिन असली उपस्थिति उन पुलिस अधिकारियों, वकीलों और पीएलवी की थी, जो रोज ऐसे मामलों से रूबरू होते हैं, जिनमें पीड़ित एक बच्चा होता है। न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1 ने सीधे शब्दों में कहा कि पॉक्सो केस केवल फाइलों तक सीमित अपराध नहीं हैं। यह बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में कानून बेहद सख्त है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है जांच और पैरवी में संवेदनशीलता। उनका कहना था कि स्टेकहोल्डर्स जितना ज्यादा संवेदनशील होंगे, पीड़ित को उतनी ही जल्दी और सही न्याय मिलेगा।

पॉक्सो कोर्ट का साफ संदेश
पहले सत्र में अतिरिक्त न्यायायुक्त-4 सह विशेष पॉक्सो न्यायाधीश बिरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कानून की बारीकियों को बेहद सरल ढंग से समझाया। उन्होंने कहा कि यौन अपराध के मामलों में समय सबसे अहम होता है। उन्होंने बताया कि 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करना सिर्फ कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चे के मानसिक हालात से भी जुड़ा हुआ है। देरी का मतलब है बच्चे और उसके परिवार की पीड़ा को और लंबा करना। उनकी बातों में कानून कम और अनुभव ज्यादा झलक रहा था।
अभियोजन की भूमिका, सिर्फ बहस नहीं
दूसरे सत्र में एडिशनल पब्लिक प्रोजिक्युटर सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि पॉक्सो मामलों में अभियोजन पक्ष की भूमिका केवल कोर्ट में बहस करने तक सीमित नहीं होती। उन्होंने कहा कि अभियोजक को पीड़ित और उसके परिवार की स्थिति को समझते हुए केस को आगे बढ़ाना होता है, ताकि न्याय सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर दिखे।

बच्चा अपराधी नहीं, जिम्मेदारी है समाज की
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में डालसा सचिव राकेश रौशन ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट पर बात रखी। उन्होंने याद दिलाया कि 18 साल से कम उम्र का बच्चा चाहे अपराध में शामिल हो या संरक्षण की जरूरत में हो, कानून उसे अपराधी नहीं मानता। इस कानून का मकसद सजा देना नहीं, बल्कि बच्चे को संभालना, सुधारना और समाज से दोबारा जोड़ना है। उनकी बातों ने यह साफ कर दिया कि न्याय का असली मतलब सिर्फ दोष तय करना नहीं, बल्कि भविष्य बचाना भी है।
एक संदेश, जो कोर्ट रूम से बाहर गया
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, लेकिन असली संदेश हॉल से बाहर निकल चुका था। पुलिस, वकील और न्यायिक अधिकारी सभी के लिए यह एक याद दिलाने वाला दिन था कि पॉक्सो और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट केवल कानून नहीं, बल्कि बच्चों के भरोसे की डोर हैं।

ये रहे मौजूद
इस अवसर पर न्यायायुक्त अनिल कुमार मिश्रा-1, अतिरिक्त न्यायायुक्त-4 सह विशेष न्यायाधीश पॉक्सो अधिनियम रांची बिरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, एडिशनल पब्लिक प्रोजिक्युटर सिद्धार्थ सिंह, डालसा सचिव राकेश रौशन, रांची जिला बार एसोसिएशन के महासचिव संजय कुमार विद्रोही, एलएडीसी चीफ प्रवीण कुमार श्रीवास्तव समेत एलएडीसी के सभी सदस्य, रांची जिले के विभिन्न थानों से आये अनुसंधानकर्तागण, पैनल अधिवक्तागण, पीएलवी, कर्मचारी, मीडियाकर्मी समेत अन्य लोग मौजूद थे।

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