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Davos/Ranchi : स्विट्ज़रलैंड के दावोस की बर्फीली वादियों में जब दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं, बड़े उद्योगपतियों और वैश्विक नेताओं की मौजूदगी होती है, वहां झारखंड की मिट्टी से निकली आवाज़ का सुनाई देना अपने आप में एक खास पल है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 में यही पल तब आया, जब भारत से पहली बार दो आदिवासी जनप्रतिनिधि एक साथ इस वैश्विक मंच पर पहुंचे।
सत्ता नहीं, पहचान की यात्रा
मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और गांडेय विधायक कल्पना मुर्मु सोरेन का दावोस पहुंचना केवल एक आधिकारिक दौरा नहीं था। यह उस समाज की यात्रा थी, जिसकी आवाज़ लंबे समय तक हाशिये पर रही। जंगल, पहाड़ और गांव से निकलकर विश्व मंच तक पहुंची यह उपस्थिति बताती है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व सिर्फ कुर्सी तक सीमित नहीं होता, वह पहचान और आत्मसम्मान से जुड़ा होता है।
व्हाइट बैज और एक ऐतिहासिक सम्मान
दावोस में सीएम हेमंत सोरेन को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का सर्वोच्च सम्मान ‘व्हाइट बैज’ दिया गया। यह सम्मान वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली नेतृत्व और सार्थक संवाद के लिए मिलता है। एक आदिवासी निर्वाचित सीएम का इस सम्मान से नवाजा जाना सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो विविधता को ताकत मानती है।
नवाजी गयीं कल्पना सोरेन
इसी मंच पर कल्पना मुर्मु सोरेन को WEF बैज से सम्मानित किया गया। झारखंड विधानसभा में महिला एवं बाल विकास समिति की अध्यक्ष के रूप में काम कर रहीं कल्पना सोरेन की मौजूदगी यह संदेश दे गयी कि आदिवासी समाज की महिलाएं भी अब वैश्विक चर्चाओं में अपनी जगह बना रही हैं। यह सम्मान उन अनगिनत महिलाओं की उम्मीद बनकर उभरा, जो अपने गांव और समाज में बदलाव की राह देख रही हैं।
आदिवासी समाज के लिए गर्व का क्षण
यह दृश्य आदिवासी समाज के लिए भावनात्मक था। पहली बार दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक मंच पर आदिवासी नेतृत्व को एक साथ सम्मान मिलना यह दिखाता है कि पहचान अब सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है। यह वर्तमान का हिस्सा बन चुकी है।
दुनिया के सामने झारखंड की कहानी
दावोस में झारखंड केवल निवेश या संसाधनों की बात नहीं कर रहा था। वहां उसकी संस्कृति, उसकी पहचान और उसका आत्मविश्वास भी मौजूद था। ‘जोहार’ सिर्फ एक शब्द नहीं रहा, वह सम्मान और बराबरी का प्रतीक बनकर गूंजा।
आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश
इस ऐतिहासिक सहभागिता ने एक साफ संदेश दिया है कि लोकतंत्र में हर आवाज़ की अहमियत है। झारखंड की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को यह भरोसा देती है कि उनकी पहचान, उनकी संस्कृति और उनका नेतृत्व अब वैश्विक मंच पर भी अपनी जगह बना सकता है।
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