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Ranchi : झारखंड के आदिवासी समाज के ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्य भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आज इस सूची की घोषणा की। उन्हें लोक कल्याण के क्षेत्र में उनके लंबे संघर्ष और योगदान के लिए यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया।
महज 13 साल की उम्र में पिता की हत्या
शिबू सोरेन के जीवन की शुरुआत ही दर्द और संघर्ष से हुई। 13 साल की उम्र में उनके पिता की हत्या महाजनों ने कर दी। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और आदिवासी समाज को महाजनों के चंगुल से बचाने का फैसला किया।
आदिवासियों के लिए संघर्ष की शुरुआत
1970 में शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ खुलेआम संघर्ष शुरू किया और धान कटनी आंदोलन की अगुवाई की। इस आंदोलन के जरिए उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित किया और सूदखोरों के खिलाफ आवाज बुलंद की।
तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन कार्यकाल सीमित
शिबू सोरेन झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री भी रहे। पहला कार्यकाल केवल 10 दिन का, दूसरा 28 अगस्त 2008 से पांच महीने का और तीसरा 30 दिसंबर 2009 से पांच महीने का रहा। इसके बावजूद उन्होंने हमेशा आदिवासी समाज के हितों को प्राथमिकता दी।
4 अगस्त 2025 को ली अंतिम सांस
शिबू सोरेन लंबे समय से किडनी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 4 अगस्त को उन्होंने अंतिम सांस ली।
राजनीतिक योगदान और देश के प्रति सेवा
वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक संरक्षक थे और यूपीए के पहले कार्यकाल में कोयला मंत्री भी रह चुके हैं। हालांकि चिरूडीह हत्याकांड में नाम आने के बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
पद्य भूषण पुरस्कार : समाज के लिए संघर्ष की पहचान
शिबू सोरेन को पद्य भूषण पुरस्कार मिलने से उनके संघर्ष, त्याग और आदिवासी समाज के लिए उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। उनका जीवन यह दिखाता है कि व्यक्तिगत दर्द भी अगर सही दिशा में लगाया जाए, तो समाज के लिए प्रेरणा बन सकता है।
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