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Home » जब कप्तान खुद मैदान में उतरे तब दस परिवारों के जान में आई जान
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जब कप्तान खुद मैदान में उतरे तब दस परिवारों के जान में आई जान

February 8, 2026No Comments4 Mins Read
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Koderma (Aftab Alam) : गडियाही (खरपोका) बिरहोर टोला…
एक छोटा सा आदिवासी गांव, जहां लोग मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। यहां जिंदगी सादगी से चलती है, लेकिन 31 जनवरी की उस शाम ने पूरे गांव की खुशियां छीन लीं।जब गांव के 10 मासूम बच्चे घर नहीं लौटे, तो हर झोपड़ी में सन्नाटा पसर गया।

श्राद्ध से शुरू हुई चिंता, जो डर में बदल गई

31 जनवरी को गांव के लोग परसाबाद में एक श्राद्ध कार्यक्रम में गए थे। बच्चे भी साथ थे। वहां सबने साथ खाना खाया, बातें कीं और फिर लौटने लगे। शाम ढलने लगी… माएं दरवाजे पर खड़ी होकर बच्चों का इंतजार करती रहीं। “अब तक क्यों नहीं आए?” “किसी के साथ तो होंगे…” शुरुआत में किसी को चिंता नहीं हुई। लेकिन जैसे-जैसे रात गहराई, दिलों में डर उतरने लगा।

मां-बाप की आंखों से गायब हुई नींद

निशा की मां बार-बार रास्ते की ओर देखती रही। रमेश के पिता गांव-गांव जाकर पूछते रहे। शिवानी की दादी भगवान से रोती हुई प्रार्थना करती रही। पूरे टोले में उस रात कोई ठीक से सो नहीं पाया। किसी को डर था कि बच्चे भटक गए होंगे। किसी को अनहोनी की आशंका सताने लगी।

जब उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझने लगी

दो दिन बीत गए। तीन दिन बीत गए। लेकिन कोई खबर नहीं। अब गांव में सन्नाटा और डर दोनों था। लोग एक-दूसरे से नजरें चुराने लगे। बच्चों के बिना घर सूने लगने लगे। आखिरकार 6 फरवरी को परिजनों ने हिम्मत जुटाकर थाना पहुंचने का फैसला किया।

पुलिस के लिए भी था यह एक इम्तिहान

जैसे ही मामला सामने आया, पुलिस कप्तान अनुदीप सिंह ने इसे सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी माना। उन्होंने कहा- “ये सिर्फ फाइल नहीं है, ये 10 परिवारों की जिंदगी है।” आठ टीमें बनाई गईं।
कोई स्टेशन पर, कोई बाजार में, कोई दूसरे राज्यों में। दिन-रात तलाश शुरू हो गई।

रेलवे स्टेशन से लेकर ढाबों तक तलाश

पुलिसकर्मी धूप, ठंड और थकान भूलकर निकले। कभी कैमरों के सामने खड़े होकर फुटेज देखते, कभी होटल वालों से पूछताछ करते, कभी बस ड्राइवरों से जानकारी लेते। कुछ अफसर तो रात में भी स्टेशन पर बैठे रहे। क्योंकि हर मिनट कीमती था।

गया से आई वो राहत भरी खबर

तलाश के बीच अचानक एक सूचना मिली – “कुछ बच्चे गया के बाल गृह में हैं।” यह खबर बिजली की तरह फैली। एसपी खुद टीम लेकर गया पहुंचे। जब बच्चों को देखा गया, तो किसी की आंखों में आंसू थे, किसी के चेहरे पर डर। लेकिन वे सुरक्षित थे। जिंदा थे। मुस्कुरा रहे थे। यही सबसे बड़ी बात थी।

जब मां ने बच्चे को सीने से लगा लिया

पहचान के लिए जब माता-पिता को बुलाया गया, तो माहौल भावुक हो गया। निशा की मां उसे देखते ही दौड़ पड़ी। रमेश के पिता फूट-फूटकर रो पड़े। शिवानी अपनी दादी की गोद में चिपक गई। किसी ने कहा…  “अब कहीं मत जाना बेटा…” किसी ने सिर्फ माथा चूम लिया। वह पल शब्दों से परे था।

डर के साए में बीते दिन

बच्चों ने बताया कि वे रास्ता भटक गए थे। डर गए थे। किसी से मदद नहीं मांग पाए। कई बार भूख लगी, कई बार रोए। लेकिन भगवान और लोगों की मदद से वे सुरक्षित पहुंच गए।

पुलिस बनी परिवार की ढाल

इस पूरे मामले में पुलिस सिर्फ जांच एजेंसी नहीं बनी, बल्कि परिवार की तरह खड़ी रही। रोज परिजनों से बात करना, उन्हें हिम्मत देना, हर नई सूचना पर दौड़ पड़ना- यही वजह रही कि मामला जल्दी सुलझ गया।

अब गांव में फिर लौटी रौनक

आज गडियाही बिरहोर टोला में फिर से बच्चों की हंसी सुनाई दे रही है।मिट्टी के आंगन में फिर से खेल है। मां की डांट में फिर से प्यार है।
घर में फिर से रौनक है। जो कुछ दिन पहले डर और आंसुओं से भरा था, अब उम्मीद और मुस्कान से भर गया है।

पुलिस अधिकारियों की मेहनत लाई रंग

इस पूरे अभियान की निगरानी IG और DIG स्तर के अधिकारी कर रहे थे। एस पी अनुदीप सिंह खुद लगातार टीमों के संपर्क में रहे और मौके पर मौजूद रहे। सीडब्ल्यूसी, एनजीओ, जीआरपी और आरपीएफ से लगातार संपर्क कर पुलिस ने हर स्तर पर प्रयास किया, जिसका नतीजा सभी बच्चों की सकुशल बरामदगी के रूप में सामने आया।

पुलिस टीम को मिला सम्मान और सराहना

इस सफल अभियान में डीएसपी मुख्यालय रतिभान सिंह, कोडरमा एसडीपीओ अनिल कुमार सिंह, ट्रेनी डीएसपी दिवाकर कुमार, माईका सर्किल इंस्पेक्टर सुजीत कुमार, डोमचांच इंस्पेक्टर अरविन्द कुमार, विनय कुमार, एसआई उमानाथ सिंह, चन्दवारा थाना प्रभारी शशि भूषण कुमार, महिला थाना प्रभारी हेमा कुमारी, टेक्निकल सेल प्रभारी विकास कुमार, बब्लू कुमार, प्रतीत टोपनो, धनेश्वर कुमार और संजय कुमार की भूमिका सराहनीय रही।

इसे भी पढ़ें : जाते-जाते ठंड ने ले लिया यू-टर्न, कब से मिलेगी राहत… जानें

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