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Home » जब एक शिक्षिका बनी बच्चों के सपनों की सारथी
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जब एक शिक्षिका बनी बच्चों के सपनों की सारथी

February 16, 2026No Comments3 Mins Read
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Pakur (Jaydev Kumar) : कहते हैं, अगर शिक्षक सिर्फ पढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों के सपनों को समझें, तो स्कूल चारदीवारी नहीं, उम्मीदों की दुनिया बन जाता है। पाकुड़ ज़िले के महेशपुर प्रखंड स्थित मध्य विद्यालय गंगड्डा में कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां प्रधानाचार्य खलीदा बेगम ने अपने काम से शिक्षा को मानवीय संवेदना से जोड़ दिया।

तीन शिक्षिकाएं और 206 जिम्मेदारियां

मध्य विद्यालय गंगड्डा में कक्षा एक से आठवीं तक की पढ़ाई होती है। कुल 206 बच्चे हैं और पढ़ाने की जिम्मेदारी सिर्फ तीन शिक्षिकाओं के कंधों पर है। संसाधन सीमित हैं, सुविधाएं भी गिनी-चुनी, लेकिन यहां बच्चों की आंखों में सीखने की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं प्रधानाचार्य खलीदा बेगम की सोच।

“ये बच्चे सिर्फ रोल नंबर नहीं हैं”

खलीदा बेगम बच्चों को सिर्फ छात्र नहीं, अपने परिवार का हिस्सा मानती हैं। वह कहती हैं, “किताबें जरूरी हैं, लेकिन जिंदगी समझने के लिए दुनिया देखना भी उतना ही जरूरी है।” यही सोच उन्हें हर दिन कुछ नया करने की प्रेरणा देती है।

जब मैडम ने अपनी जेब खोली

अक्सर सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक भ्रमण की बात बजट के अभाव में कागजों तक ही सिमट जाती है। लेकिन खलीदा बेगम ने इसे हकीकत में बदला। उन्होंने अपने वेतन से खर्च उठाकर कक्षा तीन से आठवीं तक के 50 छात्र-छात्राओं के लिए बस की व्यवस्था की और बच्चों को शैक्षणिक भ्रमण पर ले गईं।

पहली बार देखी ‘बड़ी दुनिया’

यह भ्रमण बच्चों के लिए किसी सपने से कम नहीं था। उन्होंने पाकुड़ जिला के अहम स्थलों पाकुड़ समाहरणालय, राजबाड़ी और सिदो-कान्हू मुर्मू पार्क का दौरा किया। कई बच्चों ने पहली बार जाना कि जिला प्रशासन कैसे काम करता है, इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, इमारतों और कहानियों में भी बसता है।

बच्चों की आंखों में बदला हुआ भविष्य

समाहरणालय देखकर किसी बच्चे ने कहा, “मैडम, मैं बड़ा होकर अफसर बनूंगा।” पार्क में घूमते हुए किसी ने इतिहास के नायकों के बारे में सवाल किए। उन मासूम सवालों में एक नया आत्मविश्वास झलक रहा था, मानो बच्चों ने खुद को अपने जिले, अपने समाज से जोड़ लिया हो।

शिक्षा से आगे, इंसानियत का पाठ

यह पहल सिर्फ एक शैक्षणिक भ्रमण नहीं थी, बल्कि बच्चों को यह सिखाने का तरीका था कि कोई उन पर भरोसा करता है, उनके सपनों को अहमियत देता है। खलीदा बेगम ने यह साबित कर दिया कि एक शिक्षक अगर चाहे, तो बिना बड़ी योजनाओं और फंड के भी बच्चों की सोच को नई उड़ान दे सकता है।

इसे भी पढ़ें : सलाखों के बीच उम्मीद की अदालत : जेल में इंसाफ ने दी आजादी की सांस

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