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Pakur (Jaydev Kumar) : पाकुड़ रेलवे स्टेशन की एक सामान्य सी शाम। प्लेटफॉर्म पर रोज की तरह हलचल है, लेकिन शनिवार को कुछ अलग था। कहीं कोई सजावट नहीं, न नए कपड़ों की चकाचौंध, फिर भी माहौल में त्योहार की मिठास साफ महसूस हो रही थी। यहां ईद ऐसे मन रही थी, जहां मेहमान वे लोग थे, जिनके पास अक्सर त्योहार मनाने का मौका नहीं होता।
जब किसी ने कहा, “आज हम भी ईद मना रहे हैं”
जैसे ही खाना परोसा जाने लगा, लाइन में खड़े लोगों के चेहरों पर हल्की मुस्कान दिखने लगी। किसी ने धीरे से कहा, “आज हम भी ईद मना रहे हैं।” यह सुनकर समझ आ गया कि यह सिर्फ खाना नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन परोसा गया।
एक शख्स, जो हर साल लौट आता है
इस पूरी तस्वीर के पीछे हैं समाजसेवी लुत्फल हक। पिछले करीब ढाई साल से वे रोजाना यहां जरूरतमंदों को खाना खिलाते हैं। लेकिन ईद के दिन वे खुद यहां आते हैं, ताकि इस दिन को खास बना सकें। शनिवार की शाम भी वे समय पर स्टेशन पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने पूरे इंतजाम को देखा, फिर खुद खाना चखा। यह उनका तरीका है यह सुनिश्चित करने का कि जो परोसा जा रहा है, वह बेहतर हो।
सिर्फ परोसना नहीं, साथ बैठना भी
इसके बाद वे खुद थाली लेकर लोगों के बीच उतर गए। एक-एक कर सबकी प्लेट में खाना परोसा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। वे वहीं जमीन पर बैठ गए, उन्हीं लोगों के साथ, और साथ में खाना खाया। यही पल इस आयोजन को अलग बनाता है। यहां देने वाला और पाने वाला, दोनों एक ही जगह पर बैठते हैं।

थाली में सिर्फ खाना नहीं, त्योहार भी
ईद के मौके पर खाने में दाल, चावल, दो तरह की सब्जी, पापड़, अचार और मिठाई में रसगुल्ला था। साथ में पानी की बोतल भी दी गई। यह एक साधारण थाली लग सकती है, लेकिन जिनके लिए यह तैयार की गई, उनके लिए यह पूरी ईद थी।
दुआओं में शामिल हो गया एक नाम
खाना खत्म होने के बाद कई लोग हाथ उठाकर दुआ करते दिखे। किसी ने कहा, “अल्लाह इन्हें सलामत रखे।” यह दुआ शायद किसी बड़े मंच या सम्मान से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। लुत्फल हक के लिए यह कोई नया काम नहीं है। वे लंबे समय से गरीबों की मदद करते आ रहे हैं। बेटियों की पढ़ाई और शादी, मरीजों का इलाज, अस्पतालों में ऑक्सीजन की व्यवस्था, हेलमेट वितरण जैसे कई काम वे कर चुके हैं। लेकिन रेलवे स्टेशन पर रोजाना खाना खिलाना अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
“यह दिखावे के लिए नहीं है”
जब लुत्फल हक से पूछा गया कि वे यह सब क्यों करते हैं, तो उन्होंने सीधा जवाब दिया… यह सब दिखावे के लिए नहीं है। जब जरूरतमंदों के साथ बैठता हूं, तो दिल को सुकून मिलता है। बस यही काफी है। लुत्फुलने कहा कि… ईद सिर्फ नए कपड़े पहनने या मिठाई खाने का नाम नहीं है। असली खुशी तब होती है, जब आप किसी और की खुशी का कारण बनते हैं।
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