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Godda : गोड्डा के सुंदरपहाड़ी अंचल कार्यालय का परिसर शुक्रवार को आम दिनों जैसा नहीं था। सुबह से ही वहां लोगों की आवाजाही शुरू हो गई थी। कोई अपने कागजात संभालते हुए पहुंच रहा था, तो कोई अपने परिवार के साथ मुआवजे की उम्मीद लिए कतार में खड़ा था। वजह थी जीतपुर खनन परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन के बदले मुआवजा भुगतान की शुरुआत। यह शिविर टेरी माईनिंग प्राइवेट लिमिटेड की कोल माइनिंग परियोजना से प्रभावित रैयतों के लिए लगाया गया था। इसमें कोल माइनिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, ओबी डंप, पुनर्वास स्थल और कोयला परिवहन सड़क निर्माण से प्रभावित लोग शामिल हैं। पहले दिन ही करीब डेढ़ सौ से अधिक ग्रामीणों ने शिविर में भाग लिया और अपने दस्तावेज जमा कर भुगतान प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
सुबह से ही दस्तावेज लेकर पहुंचने लगे लोग
शिविर शुरू होने से पहले ही जीतपुर, कैरोजोड़ी बड़ा, पहाड़पुर और सुंदरपहाड़ी मौजा के कई लोग कार्यालय परिसर में जमा हो चुके थे। किसी के हाथ में जमीन के कागज थे, किसी के पास आधार कार्ड और बैंक पासबुक की फोटोकॉपी। कई बुजुर्ग अपने बेटे या पोते के सहारे पहुंचे। कुछ महिलाएं भी अपने परिवार के साथ आईं। लोगों के चेहरे पर चिंता भी थी और उम्मीद भी। चिंता इसलिए कि कागज में कोई कमी न रह जाए, और उम्मीद इसलिए कि अब मुआवजे की राशि मिल सकेगी।
“जमीन गई, अब कम से कम हक तो मिले”
शिविर में मौजूद कई ग्रामीणों ने बताया कि जमीन अधिग्रहण के बाद से ही उनके परिवार की स्थिति बदल गई है। खेती पर निर्भर परिवारों के लिए जमीन सिर्फ आमदनी का साधन नहीं, बल्कि जीवन का सहारा थी। एक बुजुर्ग रैयत ने कहा कि खेती के भरोसे घर चलता था, अब जमीन चली गई तो रोजी की चिंता बढ़ गई। मुआवजा मिलने से कम से कम बच्चों की पढ़ाई और घर की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी। कई लोगों ने यह भी कहा कि परियोजना आने से इलाके में काम के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन जब तक रोजगार नहीं मिलता, मुआवजा ही उनके लिए राहत है।

अंचल कार्यालय में दिखी प्रशासन की तैयारी
अंचल कार्यालय परिसर में भीड़ को देखते हुए कुर्सी, टेबल और बैठने की व्यवस्था की गई थी। गर्मी को देखते हुए लोगों के लिए छांव की व्यवस्था भी की गई। राजस्व कर्मचारी और अंचल निरीक्षक लगातार दस्तावेज जांचते रहे और लोगों को बताया गया कि कौन सा कागज जरूरी है। कई ग्रामीण ऐसे भी थे जिन्हें प्रक्रिया की जानकारी कम थी, ऐसे में कर्मचारियों ने उन्हें फॉर्म भरने और कागजात व्यवस्थित करने में मदद की। लोगों का कहना था कि इस तरह का शिविर गांव के लोगों के लिए जरूरी है, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए बार-बार कार्यालय आना आसान नहीं होता।
दस्तावेज जमा करने के बाद बढ़ी उम्मीद
शिविर में जिला भू-अर्जन पदाधिकारी के निर्देश के अनुसार रैयतों से क्षतिपूर्ति बंधपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेज लिए गए। कई ग्रामीणों ने दस्तावेज जमा करने के बाद राहत की सांस ली। लोगों को उम्मीद है कि अब भुगतान की प्रक्रिया जल्द पूरी होगी। कागजात देने के बाद कई लोग परिसर में बैठकर आपस में बातचीत करते दिखे। चर्चा सिर्फ मुआवजे की नहीं थी, बल्कि भविष्य की भी थी कि अब खेती के बिना घर कैसे चलेगा, बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी और आगे कौन सा काम किया जाए।
कंपनी प्रतिनिधि भी रहे मौजूद
शिविर में टेरी माईनिंग प्राइवेट लिमिटेड के परियोजना प्रमुख रितेश तिवारी समेत अन्य प्रतिनिधि मौजूद रहे। उन्होंने क्षतिपूर्ति बंधपत्रों पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी की। ग्रामीणों का कहना था कि कंपनी और प्रशासन की मौजूदगी से प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहती है और लोगों को भरोसा मिलता है।
सुरक्षा व्यवस्था भी रही पुख्ता
भीड़ को देखते हुए सुंदरपहाड़ी थाना प्रभारी के नेतृत्व में पुलिस बल तैनात रहा। पूरे परिसर में पुलिस की निगरानी रही ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो। शिविर में लोग शांतिपूर्वक अपनी बारी का इंतजार करते रहे और प्रक्रिया व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ती रही।
शनिवार को भी जारी रहेगा शिविर
प्रशासन ने बताया कि मुआवजा भुगतान से संबंधित शिविर शनिवार 25 अप्रैल को भी आयोजित होगा। यह शिविर सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक चलेगा। प्रशासन ने अपील की है कि जिन रैयतों का काम अभी नहीं हो पाया है, वे समय पर अंचल कार्यालय पहुंचकर अपने दस्तावेज जमा करें ताकि प्रक्रिया पूरी हो सके।
मौके पर मौजूद रहे कई अधिकारी और कर्मचारी
शिविर के दौरान जिला भू अर्जन कार्यालय से बड़ा बाबू राकेश झा, अनुसेवक राजकुमार मोदी, लिपिक निकेश राज और कर्मचारी श्वेता कुमारी उपस्थित रहे। वहीं सीओ कार्यालय से सर्किल इंस्पेक्टर शिवलाल तुरी, बिनोद मंडल, रामसूचित महतो और अमीन सरमन राम सहित अन्य कर्मी भी मौजूद थे।
मुआवजा शिविर सिर्फ भुगतान नहीं, लोगों के भविष्य की उम्मीद
जीतपुर खनन परियोजना का यह मुआवजा शिविर सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं था, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद की शुरुआत थी जिनकी जमीन परियोजना के नाम पर चली गई। किसी के लिए यह राशि बच्चों की पढ़ाई का सहारा बनेगी, किसी के लिए नया रोजगार तलाशने की ताकत। जमीन जाने का दर्द हर चेहरे पर दिख रहा था, लेकिन मुआवजा मिलने की उम्मीद भी उतनी ही साफ नजर आ रही थी।
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