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Ramgarh (Prince Verma) : कभी दुलमी गांव की गलियों में सपने बुनने वाली एक लड़की आज देश की बड़ी खोजी पत्रकारों में गिनी जाती है। जिस बेटी के पत्रकार बनने के फैसले पर घर में सवाल उठे थे, उसी बेटी की उपलब्धियों पर आज पूरा परिवार, गांव और जिला गर्व कर रहा है। यह कहानी है दुलमी की महिमा सिंह की, जिसने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया और अपनी कलम के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
गांव की बेटी ने बड़े सपनों को दी उड़ान
रजरप्पा के दुलमी गांव में पली-बढ़ी महिमा सिंह ने शुरुआती पढ़ाई सरस्वती विद्या मंदिर, रामगढ़ से की। इसके बाद उन्होंने डीएसपीएमयू, रांची से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक और रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें सिर्फ खबरें नहीं लिखनी हैं, बल्कि उन लोगों की आवाज बनना है जिनकी बात अक्सर दब जाती है।
जब पिता ने कहा था, पत्रकारिता मत चुनो
महिमा का सफर आसान नहीं रहा। उनके पिता शैलेन्द्र सिंह चाहते थे कि बेटी किसी सुरक्षित पेशे में जाए। उन्हें पत्रकारिता के खतरों और चुनौतियों की चिंता रहती थी। लेकिन महिमा के सपनों को मां आशा देवी ने समझा। मां ने हर कदम पर बेटी का हौसला बढ़ाया। बड़े भाई नितीश भारद्वाज और निशांत कुमार ने भी बहन का साथ नहीं छोड़ा। परिवार के इस भरोसे ने महिमा को मुश्किल रास्तों पर भी आगे बढ़ने की ताकत दी। महिमा ने विरोध को रुकावट नहीं, बल्कि प्रेरणा बनाया। उन्होंने खुद से वादा किया कि एक दिन अपनी मेहनत से सबको जवाब देंगी।
जब कलम बनी सिस्टम को झकझोरने वाली ताकत
आज महिमा सिंह देश के एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान में सीनियर इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर के रूप में काम कर रही हैं। उनकी पहचान सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि ऐसे रिपोर्टर की है जो सच सामने लाने के लिए जमीनी स्तर तक पहुंचती हैं। उनकी चर्चित खोजी रिपोर्ट ‘ऑपरेशन रेड लाइट’ ने देशभर में चर्चा बटोरी। इस रिपोर्ट ने समाज के उस अंधेरे सच को उजागर किया जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था। रिपोर्ट के सामने आने के बाद प्रशासन को भी कार्रवाई करनी पड़ी। महिला सुरक्षा, शिक्षा, भ्रष्टाचार और सामाजिक मुद्दों पर उनकी कई रिपोर्टों ने लोगों का ध्यान खींचा है। यही वजह है कि पत्रकारिता के छात्रों के बीच भी उनका काम मिसाल माना जाता है।
जिस पिता ने रोका था, आज वही सबसे बड़े प्रशंसक
समय बदला और हालात भी बदले। आज वही पिता शैलेन्द्र सिंह गर्व से कहते हैं कि उनकी बेटी ने दुलमी और रामगढ़ का नाम पूरे देश में रोशन किया है। मां आशा देवी की खुशी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भी अखबार या वेबसाइट पर बेटी की कोई बड़ी खबर छपती है, उनकी आंखें खुशी से चमक उठती हैं।
दुलमी से निकली कहानी, लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा
समाजसेवी सर्वेश कुमार का कहना है कि महिमा सिंह ने साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर की मोहताज नहीं होती। अगर मेहनत और लगन हो तो गांव की मिट्टी से निकलकर भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। उनके मुताबिक, महिमा की सफलता उन लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखती हैं।
महिमा का संदेश : सपनों को कभी छोटा मत समझो
अपनी सफलता के पीछे परिवार और संघर्ष को सबसे बड़ी ताकत मानने वाली महिमा कहती हैं कि गांव की बेटियों को खुद पर भरोसा रखना चाहिए। उनका कहना है, “लोग आपको रोकेंगे, आपकी राह में मुश्किलें आएंगी। लेकिन अगर इरादा मजबूत है तो कोई भी मंजिल दूर नहीं है। सच लिखिए, सवाल पूछिए और अपने सपनों पर भरोसा रखिए। परिवार का एक सदस्य भी अगर आपके साथ खड़ा हो जाए तो पूरी दुनिया बदल सकती है।”
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