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Home » झारखंड के ये 11 उत्पाद अब हो सकेंगे एक्सपोर्ट, मिला GI टैग
झारखंड

झारखंड के ये 11 उत्पाद अब हो सकेंगे एक्सपोर्ट, मिला GI टैग

June 14, 2026No Comments5 Mins Read
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Ranchi : झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक शिल्पकला को इस वर्ष बड़ी उपलब्धि मिली है। राज्य के 11 विशिष्ट उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्रदान किया गया है। इनमें से चार उत्पादों को जीआई टैग दिलाने में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह उपलब्धि न केवल झारखंड की पारंपरिक कला और शिल्प को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाएगी, बल्कि हजारों कारीगरों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादकों की आजीविका को भी मजबूत बनाएगी।जीआई टैग मिलने वाले उत्पादों में कोडरमा का प्रसिद्ध केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, भगैया साड़ी एवं फैब्रिक्स, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प समेत कुल 11 उत्पाद शामिल हैं। इससे पहले वर्ष 2021 में झारखंड की प्रसिद्ध सोहराई-कोहबर पेंटिंग को भी जीआई टैग मिल चुका है।

क्या होता है GI टैग और क्यों है महत्वपूर्ण

जीआई टैग किसी उत्पाद की विशेष भौगोलिक पहचान और उसकी प्रामाणिकता का प्रमाण होता है। यह बताता है कि संबंधित उत्पाद किसी खास क्षेत्र में ही अपनी विशिष्ट गुणवत्ता, परंपरा और तकनीक के कारण जाना जाता है। जीआई टैग मिलने के बाद उत्पाद की बाजार में अलग पहचान बनती है और उसे बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है।विशेषज्ञों का कहना है कि इससे नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है और असली उत्पाद बनाने वाले कारीगरों तथा उत्पादकों को सीधा लाभ मिलता है।

नाबार्ड के प्रयासों से मिली बड़ी सफलता

नाबार्ड झारखंड के अनुसार यह उपलब्धि वर्षों की सामूहिक मेहनत का परिणाम है। इस प्रक्रिया में स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों, सरकारी विभागों, तकनीकी संस्थानों और स्थानीय समुदायों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।नाबार्ड ने उत्पादों की विशेषताओं की पहचान करने, उनका दस्तावेजीकरण कराने, उत्पादकों को संगठित करने, मूल्य श्रृंखला को मजबूत बनाने और जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी कराने में अहम भूमिका निभाई है।

रेशम परंपरा को मिली नई उड़ान

भगैया सिल्क और कुचाई सिल्क को जीआई टैग मिलने से झारखंड की रेशम परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। इन उत्पादों का निर्माण स्थानीय ज्ञान और पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक तकनीकों के आधार पर किया जाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की मांग देश और विदेश दोनों बाजारों में बढ़ सकती है। इससे रेशम उत्पादन से जुड़े हजारों परिवारों को आर्थिक लाभ मिलेगा।

मुंडा ज्वेलरी बनी जनजातीय गौरव का प्रतीक

मुंडा ज्वेलरी को जीआई टैग मिलना झारखंड की जनजातीय संस्कृति के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। अपनी अनोखी डिजाइन, पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक महत्व के कारण यह आभूषण मुंडा समुदाय की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।जानकारों का कहना है कि इस मान्यता से आदिवासी कारीगरों को नए बाजार मिलेंगे और उनकी आय बढ़ाने के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही युवा पीढ़ी भी इस पारंपरिक कला से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी।

झारखंड बांस शिल्प को मिली नई पहचान

झारखंड बांस शिल्प को जीआई टैग मिलने से राज्य के ग्रामीण कारीगरों के हुनर को नई पहचान मिली है। बांस से बने उपयोगी और आकर्षक उत्पाद अब बड़े बाजारों तक पहुंच सकेंगे।इससे बांस आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग का भी लाभ स्थानीय कारीगरों को मिल सकता है।

इस वर्ष इन 11 उत्पादों को मिला GI टैग

मार्च 2026 में झारखंड के जिन 11 उत्पादों को जीआई टैग मिला है, उनमें शामिल हैं:

  • भगैया साड़ी एंड फैब्रिक्स
  • कुचाई सिल्क
  • कोडरमा का केसरिया कलाकंद
  • डोकरा क्राफ्ट
  • दुमका चादर बादोनी पपेट्स
  • मुंडा ज्वेलरी
  • झारखंड बांस शिल्प
  • तसर सिल्क एंड साड़ीज
  • जादुपटुआ पेंटिंग
  • पांची साड़ी एंड फैब्रिक्स
  • झारखंड बेनाम

सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है GI टैग

नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष ने कहा कि यह उपलब्धि झारखंड की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। उनके अनुसार जीआई टैग केवल उत्पादों को पहचान और व्यावसायिक मूल्य ही नहीं देता, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी पारंपरिक कलाओं और शिल्प से जोड़ने का काम भी करता है।उन्होंने बताया कि नाबार्ड प्रदर्शनी, ग्रामीण हाट, खरीदार-विक्रेता बैठक, सरस मेला और अन्य विपणन मंचों के जरिए इन उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम कर रहा है।

ब्रांडिंग, निर्यात और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की ब्रांडिंग मजबूत होगी। निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी और राज्य में पर्यटन को भी नया प्रोत्साहन मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पारंपरिक उत्पादों से होने वाला आर्थिक लाभ सीधे उन समुदायों तक पहुंचेगा, जिन्होंने पीढ़ियों से इन कलाओं और परंपराओं को जीवित रखा है।झारखंड के लिए यह उपलब्धि केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले वर्षों में यह मान्यता राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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