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Ranchi : रेलवे स्टेशन सिर्फ मुसाफिरों के आने-जाने की जगह नहीं होता, बल्कि यहां हर दिन कई कहानियां आकर दम तोड़ती हैं या फिर उन्हें एक नया मोड़ मिलता है। बीते सोमवार यानी 6 जुलाई को रांची रेलवे स्टेशन पर भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। RPF यानी रेलवे सुरक्षा बल की सजगता ने जहां अपनों से नाराज होकर घर छोड़ चुके दो मासूम बच्चों को किसी बड़ी मुसीबत में फंसने से बचा लिया, वहीं एक ऐसे शख्स को भी दबोचा जो चंद पैसों के मुनाफे के लिए सैकड़ों यात्रियों की जान जोखिम में डालकर ट्रेन से पटाखों की तस्करी करने की फिराक में था।
पहला मामला : पिता की मार से सहमी 15 साल की किशोरी, सहेली के पास जा रही थी बंगाल
रांची स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 1 हमेशा की तरह खचाखच भरा था। इसी भीड़ के बीच, स्टेशन मास्टर के दफ्तर के ठीक सामने एक कोने में 15 साल की एक बच्ची बेहद डरी और सहमी हुई बैठी थी। उसकी नजरें जमीन पर टिकी थीं और चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी। RPF की ‘नन्हे फरिश्ते’ टीम और चाइल्डलाइन के सदस्य जब रूटीन गश्त पर निकले, तो उनकी नजर इस अकेली बच्ची पर पड़ी। जब महिला सब इंस्पेक्टर सुशीला बराइक ने उसके पास जाकर प्यार से सिर पर हाथ रखा, तो बच्ची की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने अपना नाम सीमा कुमारी (बदला हुआ नाम) बताया, जो गुमला जिले के डुमरी इलाके के एक छोटे से गांव चिरैया की रहने वाली थी।

सीमा ने बताया कि घर में पिता ने उसे बहुत बुरी तरह डांटा और मार दिया था। गुस्से और दुख में आकर उसने घर छोड़ दिया और अपनी एक सहेली से मिलने पश्चिम बंगाल जाने के लिए रांची स्टेशन आ गई। उसे यह अंदाजा भी नहीं था कि इस अनजान दुनिया में अकेले निकलना उसके लिए कितना खतरनाक हो सकता था। आरपीएफ ने उसे तुरंत अपनी सुरक्षा में लिया। जरूरी कागजी कार्रवाई के बाद, शाम करीब सवा सात बजे उसे चाइल्डलाइन की सुपरवाइजर अर्पणा को सौंप दिया गया, ताकि उसे सुरक्षित माहौल मिल सके। इस नेक काम में हेड कांस्टेबल पी. पान, कांस्टेबल चंद्रिका और जिनिद टोपनो ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
दूसरा मामला : मां की रोज-रोज की डांट से परेशान 12 साल का करण घर छोड़कर भागा
अभी सीमा को ढांढस बंधाया ही जा रहा था कि प्लेटफॉर्म नंबर 3 से एक और भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई। सुबह की धूप के बीच एक 12 साल का छोटा सा बच्चा संदिग्ध हालत में अकेला भटक रहा था। वह कभी इस ट्रेन को देखता तो कभी उस ट्रेन को। आरपीएफ के जवानों को भांपते देर नहीं लगी कि बच्चा किसी मुसीबत में है।
सब इंस्पेक्टर सुनीता तिर्की और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर सुरेंद्र कुमार ने बच्चे को रोककर पूछताछ की। बच्चे ने अपना नाम राकेश कुमार (बदला हुआ नाम) बताया। वह रहने वाला तो समस्तीपुर (बिहार) का था, लेकिन फिलहाल उसका परिवार रांची के लालपुर में रह रहा था।

राकेश ने रोते हुए बताया कि मां उसे हर छोटी बात पर बार-बार डांटती थी। उस दिन भी मां की डांट से उसका दिल ऐसा टूटा कि वह बिना किसी को कुछ बताए चुपचाप घर से निकल पड़ा। वह कहां जाएगा, क्या करेगा, उसे कुछ नहीं पता था। आरपीएफ की टीम उसे तुरंत आरपीएफ पोस्ट लेकर आई, उसे पानी पिलाया और तसल्ली दी। इसके बाद उसे भी सुरक्षित तरीके से चाइल्डलाइन रांची के सुपुर्द कर दिया गया ताकि उसे दोबारा उसकी मां की गोद मिल सके। इस रेस्क्यू में हेड कांस्टेबल पीसी महतो ने भी अहम रोल निभाया।
तीसरा मामला : ‘ऑपरेशन संरक्षा’ के तहत बारूद तस्कर को दबोचा
एक तरफ जहां आरपीएफ बच्चों के लिए फरिश्ता बनी हुई थी, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी उनकी आंखें चौकन्ना थी। रांची के ही नामकुम रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर मुख्य गेट के पास एक बड़ा सा प्लास्टिक का बैग और कार्टन लावारिस हालत में पड़ा था। ड्यूटी पर तैनात हेड कांस्टेबल जोगेश्वर कुमार को कुछ गड़बड़ी का अहसास हुआ। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों को दी।

सूचना मिलते ही ASI सुनील केरकेट्टा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। जब प्लेटफॉर्म पर मौजूद मुसाफिरों से कड़ाई से पूछताछ की गई, तो भीड़ में से 28 साल का एक युवक आगे आया। उसने अपना नाम रतन कुमार महतो बताया, वो रांची के सिल्ली का रहने वाला था। उसने कबूल किया कि यह डिब्बा उसी का है और इसमें पटाखे भरे हैं।
जब RPF ने कार्टन खोलकर देखा तो सबके होश उड़ गए। उसके अंदर पटाखों के 18 बड़े-बड़े पैकेट थे, जिनकी कीमत करीब 7,800 रुपये थी। ट्रेन या रेलवे परिसर में बारूद, पटाखे या कोई भी ज्वलनशील चीज ले जाना किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा है। आरपीएफ ने तुरंत उन पटाखों और खरीद बिल को जब्त कर लिया। आरोपी रतन कुमार महतो को रेलवे एक्ट की धारा 164 और 179(2) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इस बड़ी कामयाबी में इंस्पेक्टर शिशपाल कुमार और प्रधान आरक्षक खागेश कुमार महतो की भी मुख्य भूमिका रही।
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