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Ranchi/Giridih : झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को नक्सली मोर्चे पर एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक सफलता हाथ लगी है। राज्य में माओवादी गतिविधियों की रीढ़ माने जाने वाले और 1 करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष नक्सली नेता मिसिर बेसरा को गिरफ्तार कर लिया गया है। मिसिर बेसरा प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) की सर्वोच्च नीति-निर्धारक बॉडी पोलित ब्यूरो का बेहद ताकतवर सदस्य रहा है। सुरक्षा बलों की संयुक्त टीम ने उसे गिरिडीह और धनबाद जिले की सीमा से सटे इलाके से दबोचा है।
इस बड़े ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों ने बेसरा के साथ संगठन के दो अन्य सक्रिय कैडरों मोछू और सौरभ उर्फ गौरव को भी गिरफ्तार किया है। इसके अलावा दो स्थानीय ग्रामीणों को भी हिरासत में लिया गया है। फिलहाल खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां किसी गुप्त ठिकाने पर सभी से अलग-अलग और गहराई से पूछताछ में जुटी हुई हैं।
गिरिडीह के छोटे से गांव से पोलित ब्यूरो तक का सफर
मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर, उर्फ सुनिर्मल, उर्फ प्रदीप मूल रूप से गिरिडीह जिले के मदनाडीह गांव का रहने वाला है। उसका जन्म 1960 के आसपास हुआ था। गांव से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए धनबाद चला गया था। वहां उसने राजगंज से राजनीति विज्ञान में बीए और एमए की डिग्री हासिल की। 1980 के दशक में जब अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर उथल-पुथल चल रही थी, उसी दौर में वह वामपंथी उग्रवादी विचारधारा की चपेट में आ गया। उसने अपना घर-परिवार छोड़ दिया और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) में एक साधारण कार्यकर्ता के तौर पर शामिल हो गया। अपनी रणनीतिक समझ के दम पर वह जल्द ही संगठन में बड़ा नाम बन गया। साल 2004 में MCCI और पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) के विलय के बाद जब भाकपा (माओवादी) बना, तब तक बेसरा माओवादियों की सैन्य इकाई का मुख्य रणनीतिकार बन चुका था। बाद में उसे संगठन की सबसे ऊंची कमान ‘पोलित ब्यूरो’ में जगह दी गई।
55 जवानों की शहादत और दुस्साहसिक जेलब्रेक
मिसिर बेसरा झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में दर्जनों बड़ी हिंसक वारदातों का मुख्य साजिशकर्ता रहा है। उसके खिलाफ हत्या, सुरक्षा बलों पर घातक हमले, आईईडी (IED) ब्लास्ट और करोड़ों रुपये की लेवी (रंगदारी) वसूली के संगीन मामले दर्ज हैं।
चाईबासा के बलिबा और बिटकिलसोय में सुरक्षा बलों पर हुए भीषण आईईडी ब्लास्ट और फायरिंग का मास्टरमाइंड वही था, जिसमें 55 से ज्यादा जवान शहीद हो गए थे। इसके अलावा जून 2009 में जब उसे बिहार के लखीसराय कोर्ट में पेशी के लिए लाया जा रहा था, तब 30 से ज्यादा हथियारबंद माओवादियों ने पुलिस टीम पर अंधाधुंध बमबारी और फायरिंग करके उसे छुड़ा लिया था। उस दुस्साहसिक जेलब्रेक कांड में भी एक पुलिसकर्मी शहीद हुआ था।
परिवार छूटा, बेटा आज भी कर रहा मजदूरी
उग्रवाद के रास्ते पर निकलने के बाद मिसिर बेसरा का अपने परिवार से नाता पूरी तरह टूट गया। उसकी शादी मोनासी देवी से हुई थी, लेकिन बेसरा के बरसों तक अंडरग्राउंड रहने के बाद उसकी पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया। बेसरा का एक बेटा है—सिद्धार्थ। सिद्धार्थ ने अपने पिता के खतरनाक रास्ते को पूरी तरह नकार दिया। वह हिंसा से दूर रहकर एक आम नागरिक की तरह रहता है और दिहाड़ी मजदूरी करके ईमानदारी से अपना पेट पालता है।
सुरक्षा बलों का शिकंजा और नेटवर्क की तबाही
हाल के कुछ सालों में सीआरपीएफ, कोबरा और झारखंड जगुआर की टीमों ने सारंडा और कोल्हान के घने जंगलों में ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ और ‘ऑपरेशन मेघाबुरु’ चलाकर माओवादियों के कमर तोड़ दी है। संगठन के कई शीर्ष कमांडर या तो मुठभेड़ में मारे गए या फिर उन्होंने सरेंडर कर दिया। इस इलाके में माओवादी संगठन को बचाए रखने वाला मिसिर बेसरा ही आखिरी सबसे बड़ा चेहरा बचा था। उसके पकड़े जाने से संगठन का ढांचा लगभग ध्वस्त हो गया है।
पूछताछ से खुल सकते हैं वसूली और सप्लाई के नेटवर्क
पुलिस को उम्मीद है कि मिसिर बेसरा और उसके साथियों से पूछताछ में संगठन के शीर्ष नेतृत्व की हरकतों, हथियारों की सप्लाई लाइन, लेवी वसूली के बड़े नेटवर्क और उनके गुप्त ठिकानों का पता चलेगा। पुलिस उसके पास से जब्त मोबाइल, डायरी और अन्य दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही है। वहीं, पकड़े गए दो ग्रामीणों से यह पता लगाया जा रहा है कि वे डर के मारे माओवादियों को पनाह दे रहे थे या फिर उनका संगठन से कोई सीधा संपर्क था।
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