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Ramgarh (Dharmendra Pradhan) : भोर की पहली किरण जब रामगढ़ की पहाड़ियों को छूकर निकलती है, तब तक खेतों में जिंदगी की चहल-पहल शुरू हो चुकी होती है। सावन की भीनी-भीनी बारिश ने पतरातू से लेकर गोला और रजरप्पा तक की जमीनों को गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू से भर दिया है। कीचड़ से सने नंगे पांव, हाथों में हरी-भरी धान की पौध और माथे पर ढलकती पसीने की बूंदें, कुछ ऐसा ही नजारा आज रामगढ़ के हर गांव में देखने को मिल रहा है। यह सिर्फ एक फसल लगाने का मौसम नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की जिंदगी की नई शुरुआत है, जिनकी पूरी गृहस्थी इसी मिट्टी के सहारे सांस लेती है।
सांझी मेहनत और लोकगीतों के बीच जब थकान भी बन जाती है उत्सव
कीचड़ भरे खेतों में जब महिलाएं एक कतार में झुककर धान रोप रही होती हैं, तो अचानक ही किसी के गले से पारंपरिक लोकगीत फूट पड़ता है। देखते ही देखते पूरा खेत सुरीली तानों से गूंज उठता है। यह झारखंड की सदियों पुरानी वह मिठास है, जो कड़ी धूप और लगातार काम की थकान को पल भर में दूर कर देती है। यहां कोई बड़ा या छोटा नहीं है। आज अगर किसी पड़ोसी के खेत में रोपनी है, तो पूरा गांव बिना किसी स्वार्थ के मदद के लिए उमड़ पड़ता है। पुरुषों का ध्यान खेतों को समतल करने, हल चलाने और पानी के बहाव को सही दिशा देने पर है। यह आपसी मेलजोल ही है जो आज भी हमारी ग्रामीण संस्कृति को जिंदा रखे हुए है।
दिन-रात पसीना बहाने के बाद भी एक डर हमेशा बना रहता है साथ
लेकिन इस खुशनुमा माहौल के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है। खेत किनारे बने छोटे से छप्पर के नीचे गमछे से अपना पसीना पोंछते हुए एक बुजुर्ग किसान कहते हैं कि बारिश ने इस बार चेहरे पर खुशी तो दी है, लेकिन डर इस बात का है कि जब फसल कटकर घर आएगी तो उसका मोल क्या मिलेगा। आज बीज, खाद, दवाइयों और खेत की जुताई सब कुछ बेहद महंगा हो चुका है। महीनों तक हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद जब पैदावार को बाजार ले जाया जाता है, तो बिचौलिए और मंडी के भाव किसानों के सारे सपनों को तोड़ देते हैं। लागत निकालना भी कई बार भारी पड़ जाता है।
सिर्फ फसल नहीं, किसान की मेहनत और सम्मान का भी मिले सही दाम
खेतों में लहराती धान की यह पौध केवल अनाज का दाना नहीं, बल्कि किसी बेटी की शादी की उम्मीद है, तो किसी बच्चे की स्कूल फीस का जरिया। अन्नदाता का मानना है कि अगर सरकार समय पर और सही तरीके से समर्थन मूल्य पर फसल की खरीदारी तय कर दे, तो उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। सावन की हरियाली के बीच बहता यह पसीना आने वाले दिनों में पूरे सूबे का पेट भरेगा। ऐसे में रामगढ़ के इन मेहनतकश हाथों की बस इतनी ही गुजारिश है कि जब उनकी पैदावार बाजार पहुंचे, तो उन्हें उनकी मेहनत का वाजिब दाम और सम्मान दोनों मिले, ताकि खेतों की हरियाली उनके अपने घरों तक भी पहुंच सके।
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