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Home » माटी का कर्ज, बंजर होती धरती और आने वाले कल की फिक्र, क्या बोल गये सीएम… जानें
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माटी का कर्ज, बंजर होती धरती और आने वाले कल की फिक्र, क्या बोल गये सीएम… जानें

August 11, 2026No Comments7 Mins Read
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सीएम
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Ranchi : रांची के विधानसभा के विशाल प्रांगण में आज जब माटी की सोंधी खुशबू तैर रही थी, तब राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र एक बिल्कुल अलग रूप में नजर आ रहा था। मौका था 77वें राज्यव्यापी वन महोत्सव का। आम दिनों में जहां गाड़ियों के सायरन, वीआईपी हलचल और तल्ख राजनीतिक बहसों का माहौल रहता है, वहां मंगलवार को चारों तरफ फैली हरियाली, नन्हे पौधों की कतारें और पर्यावरण को बचाने का संकल्प दिखाई दे रहा था।

झारखंड विधानसभा के हरित परिसर में सीएम हेमंत सोरेन और विधानसभा अध्यक्ष रबींद्र नाथ महतो के हाथों में कुदाल और नन्हे पौधे थे। मुख्यमंत्री के चेहरे पर एक तरफ प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान था, तो दूसरी तरफ आंखों में आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य को लेकर एक अनकही फिक्र। जब वे मंच पर पहुंचे और बोलना शुरू किया, तो उनके शब्दों में किसी पारंपरिक सरकारी भाषण की औपचारिकता नहीं थी। उनके लफ्जों में अपनी माटी के प्रति गहरा लगाव और कुदरत से हो रही इंसानी बेवफाई पर दर्द छलक रहा था।

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“झारखंड केवल कोई भौगोलिक टुकड़ा या नक्शे पर खिंची लकीर नहीं है। झारखंड नाम ही हमारी पहचान है… झार यानी जंगल और खंड यानी जमीन का टुकड़ा। जल, जंगल, पहाड़ और नदियां हमारी संपत्ति या जमीन के संसाधन भर नहीं हैं, यह हमारी संस्कृति हैं, हमारी परंपरा हैं और हमारे जीने का एकमात्र आधार हैं।” सीएम जब ये बातें कह रहे थे, तब उनके जेहन में झारखंड के वे मासूम बच्चे थे, जिन्हें आने वाले दशकों में कंक्रीट के जंगलों के बीच साफ हवा और पीने के पानी के लिए तरसना पड़ सकता है।

जब एक पेड़ गिरता है तो सिर्फ लकड़ी का तना नहीं टूटता, एक पूरा संसार उजड़ जाता है

सीएम हेमंत सोरेन ने बहुत ही सरल और व्यावहारिक अंदाज में तरक्की और तबाही के बीच के फर्क को सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज के दौर में हमने विकास की परिभाषा को बहुत सीमित कर दिया है। चौड़ी सड़कें, बड़ी-बड़ी गाड़ियां, कंक्रीट के मकान और गगनचुंबी इमारतों को ही हम तरक्की मान बैठे हैं। लेकिन इस तथाकथित तरक्की की बेहद भारी कीमत हमारी नदियां, हमारे पुराने जंगल और ज़मीन के नीचे जमा सदियों पुराना पानी चुका रहा है।

वे आगे बोले, “जब कुल्हाड़ी किसी पुराने पेड़ पर चलती है, तो जमीन पर सिर्फ लकड़ी का एक बेजान तना नहीं गिरता। उस एक पेड़ के साथ परिंदों का आशियाना उजड़ जाता है, जमीन की सदियों पुरानी नमी गायब हो जाती है और इंसानों की उम्र के कई साल कम हो जाते हैं। हमने नदियों के स्वाभाविक रास्ते में बांध बना दिए, खानों से खनिजों का बेतहाशा दोहन किया और सबमर्सिबल पंपों के जरिए भूजल का आखिरी कतरा भी खींचने की होड़ में लग गए। अगर कुदरत के साथ हमारी यह बेदर्दी ऐसे ही चलती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पानी की हर बूंद के लिए जंग जैसी स्थिति बन जाएगी।”

सीएम हेमंत सोरेन ने चेताया कि इंसान यह भूल बैठा है कि वह प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। जब जंगल और नदियां खत्म होंगी, तो उसका सबसे पहला और सबसे घातक असर इंसानों के साथ-साथ उन बेजुबान पशु-पक्षियों पर पड़ेगा जो अपनी फरियाद लेकर किसी अदालत या सरकार के पास नहीं जा सकते।

भाषणों का दौर बीता, अब जमीन पर कुदाल उठाने की बारी है

अमूमन सरकारी कार्यक्रमों में लंबे-चौड़े वादे किए जाते हैं, नीतियां गिनाई जाती हैं और मंच से पर्यावरण बचाने के कसीदे पढ़े जाते हैं। लेकिन सीएम ने इस बार बेबाकी से इस पुरानी परंपरा पर चोट की। उन्होंने साफ-साफ कहा कि पर्यावरण दिवस या वन महोत्सव के नाम पर बड़े-बड़े मंच सजाना, संगोष्ठियों में भारी-भरकम शब्द बोलना और कागजों पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाना अब बंद होना चाहिए।

“हम आज हैं, कल नहीं रहेंगे। यह कुदरती नियम है। लेकिन हमारी आज की लापरवाही और बेवकूफियों की सजा हमारे मासूम बच्चे क्यों भुगतें?” उनके इस सवाल ने वहां मौजूद हर शख्स को सोचने पर मजबूर कर दिया।

सीएम ने वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के उच्च अधिकारियों को सीधे निर्देश देते हुए कहा कि वन महोत्सव को महज एक दिन का सरकारी आयोजन या फोटो खिंचवाने का अवसर न बनाया जाए। आज बड़े उत्साह से पौधा रोप दिया जाए और दो दिन बाद वह पौधा बिना पानी और खाद के सूखकर तिनका बन जाए, यह प्रकृति के साथ एक तरह का धोखा है।

उन्होंने अधिकारियों को कड़े लहजे में कहा कि पौधा लगाने से ज्यादा जरूरी उसे बचाना है। विभाग एक ऐसा कैलेंडर तैयार करे जिसमें पौधों को पानी देने, खाद डालने और उनकी बाड़बंदी (फेंसिंग) करने की तारीखें तय हों। जब तक एक पौधा मजबूत पेड़ न बन जाए, तब तक उसकी जवाबदेही संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की होनी चाहिए।

बारिश की हर बूंद को सहेजना होगा, वरना प्यासा रहेगा भविष्य

सूखे की आशंका और गिरते भूजल स्तर पर बात करते हुए मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण को आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि केवल झारखंड या भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया इस समय पानी के गहरे संकट के मुहाने पर खड़ी है। अगर हमने आज वर्षा जल का संचयन नहीं किया, तो कल बहुत देर हो जाएगी।

“आसमान से बरसने वाला पानी यूं ही बहकर नालों में बर्बाद हो जाए और नदियां सूख जाएं, यह हमारी नासमझी है। बारिश के पानी को सहेजकर ज़मीन के भीतर उतारने (ग्राउंडवॉटर रिचार्ज) के लिए एक ठोस और व्यापक योजना पर काम करना होगा।” उन्होंने कहा कि चाहे छोटे गांव हों या बड़े शहर, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को हर घर और हर सरकारी इमारत के लिए एक आदत बनाना होगा।

झारखंड की भौगोलिक ताकत की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि हमारे पास कुदरत का दिया हुआ खजाना है। नदियां, पहाड़ और घने जंगल हमारी सबसे बड़ी ढाल हैं। इन संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि हमारी जरूरतें भी पूरी हों और हमारी आने वाली नस्लें भी इसका फल चख सकें।

माननीयों के आंगन में खिलेंगे फलदार पौधे, जनता के लिए बनेंगे मिसाल

इस बार के वन महोत्सव में एक बेहद अनोखी और मानवीय पहल की घोषणा की गई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि केवल विधानसभा परिसर या सरकारी पार्कों तक इस अभियान को सीमित न रखें। राज्य के सभी विधायकों के सरकारी आवासों में भी फलदार और छायादार पौधे लगाए जाएं।

इस पहल के पीछे की व्यावहारिक सोच को साझा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जब कोई विधायक या जनप्रतिनिधि खुद अपने आंगन में रोपे गए नन्हे पौधे की देखभाल करेगा, सुबह-शाम उसे पानी देगा और उसकी टहनियों को सहेजेगा, तो उस क्षेत्र की जनता भी इससे प्रेरणा लेगी। नेता जब खुद कुदाल उठाकर पौधा रोपेगा, तो समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा।

उन्होंने कहा कि जब वह पौधा बड़ा होकर फल देगा, तो वह सिर्फ एक मीठा फल नहीं होगा, बल्कि अपनी माटी के प्रति निभाई गई जिम्मेदारी और मेहनत का प्रतीक होगा।

एक पौधा, स्वच्छ हवा और सुरक्षित कल का अनमोल उपहार

कार्यक्रम के दौरान विधानसभा अध्यक्ष रबींद्र नाथ महतो ने भी पर्यावरण संरक्षण को आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत बताया। प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया और विभाग की योजनाओं का खाका सामने रखा। इस मौके पर मंत्री हफीजुल हसन, इरफान अंसारी, शिल्पी नेहा तिर्की और विधायक कल्पना सोरेन सहित राज्य के कई वरिष्ठ प्रशासनिक व वन अधिकारी मौजूद थे।

समारोह के अंत में, जब सीएम परिसर से विदा ले रहे थे, तो उन्होंने राज्य के हर नागरिक के नाम एक दिल छूने वाली अपील दोहराई। उन्होंने कहा, “अपने जीवन में कम से कम एक पौधा जरूर लगाइए। उसे केवल मिट्टी में रोपकर भूल मत जाइए, बल्कि उसे तब तक सींचिए जब तक कि वह अपनी जड़ों पर खड़ा न हो जाए। आज आपके हाथों से रोपा गया एक नन्हा सा पौधा, कल आपके बच्चों और उनके बच्चों के लिए ठंडी छांव, स्वच्छ हवा और एक सुरक्षित जिंदगी का वो अनमोल तोहफा बनेगा, जिसे दुनिया की कोई दौलत या तिजोरी नहीं खरीद सकती।”

इसे भी पढ़ें : छात्र आंदोलन पर CM हेमंत का संदेश- शांतिपूर्ण आवाज का सम्मान, बातचीत से सुलझाएंगे मामला

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