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Ranchi : झारखंड के सिमडेगा जिले में रूबेला वायरस यानी जर्मन खसरा का इस सीजन का पहला मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग सतर्क हो गया है। ठेठईटांगर प्रखंड के मुंडाटोली में 10 साल की बच्ची के संक्रमित मिलने के बाद इलाके में निगरानी बढ़ा दी गई है। संक्रमण को आसपास फैलने से रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीमें सक्रिय हैं। वहीं, जिन बच्चों का मीजल्स-रूबेला यानी MR का टीका किसी कारण से छूट गया है, उन्हें टीका लगाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
स्थिति को देखते हुए रिम्स और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से राज्यस्तरीय वॉर रूम तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसका मकसद संक्रमण की स्थिति पर लगातार नजर रखना और जरूरत पड़ने पर इलाज व स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से सक्रिय करना है। रूबेला को लेकर सबसे ज्यादा चिंता गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर है। गर्भावस्था के दौरान रूबेला संक्रमण होने पर गर्भ में पल रहे बच्चे पर गंभीर असर पड़ सकता है।
क्या है रूबेला और कैसे फैलता है संक्रमण
रूबेला एक RNA वायरस से होने वाला संक्रमण है। इसे जर्मन खसरा भी कहा जाता है। आमतौर पर इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं, इसलिए कई बार लोग इसे सामान्य बुखार या शरीर पर निकलने वाले दानों की बीमारी समझ लेते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। गर्भवती महिलाओं में संक्रमण होने पर इसका खतरा और बढ़ जाता है।
रूबेला संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या सांस के साथ निकलने वाली छोटी बूंदों के जरिए दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है। संक्रमण के बाद हल्का बुखार, सिरदर्द, आंखों में लालिमा और शरीर पर गुलाबी रंग के दाने दिखाई दे सकते हैं। कई लोगों में लक्षण बहुत हल्के होते हैं, इसलिए संक्रमण की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रूबेला को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और निगरानी से संक्रमण के फैलाव को रोकने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य विभाग की टीम एक्टिव केस की तलाश कर रही है और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों पर भी नजर रखी जा रही है।
गर्भवती महिलाओं के लिए क्यों ज्यादा खतरा
रूबेला संक्रमण गर्भावस्था के दौरान विशेष चिंता का विषय बन जाता है। अगर गर्भवती महिला को संक्रमण हो जाए तो गर्भ में पल रहे बच्चे में जन्मजात रूबेला सिंड्रोम का खतरा बढ़ सकता है। इससे बच्चे की सुनने की क्षमता प्रभावित होने के साथ कई अन्य जन्मजात समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।
स्वास्थ्य विभाग प्रभावित क्षेत्र में एक्टिव केस की खोज के साथ मीजल्स-रूबेला टीकाकरण की माइक्रो लेवल मॉनिटरिंग भी कर रहा है। 9 महीने से 5 साल तक के बच्चों को चिन्हित कर टीकाकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जिन बच्चों का टीका किसी कारण से छूट गया है, उन्हें अभियान के तहत टीका लगाने की कोशिश की जा रही है।
बच्चे को बुखार के साथ शरीर पर दाने, आंखों में लालिमा या रूबेला से जुड़े दूसरे लक्षण दिखाई दें तो अभिभावकों को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसे में बच्चे को डॉक्टर को दिखाना बेहतर है। खुद से दवा देने से बचना चाहिए। संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों की निगरानी भी जरूरी है।
समय पर पहचान, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी और बच्चों का टीकाकरण रूबेला संक्रमण के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है। अभिभावकों को बच्चों के टीकाकरण की स्थिति जांचनी चाहिए और कोई टीका छूटा हो तो स्वास्थ्यकर्मियों से संपर्क करना चाहिए।
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