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Patna : हवा में गर्म सोंधे लिट्टी-चोखे की महक, कानों में बजती चूड़ियों की खनक और आंखों के सामने लोककला के सतरंगी रंग। कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों पटना के ज्ञान भवन में देखने को मिल रहा है, जहां बिहार सरस मेला सजा हुआ है। दोपहर के बारह बजते ही मेले के मुख्य द्वार पर लोगों की ऐसी कतार लगती है कि पैर रखने की जगह नहीं बचती। कोई अपनी दादी के लिए हाथ से कुटा हुआ कतरनी चूड़ा तलाश रहा है, तो कोई बैठक की दीवार सजाने के लिए असली मधुबनी पेंटिंग के मोलभाव में जुटा है। गांव की आत्मनिर्भर महिलाओं के हुनर का जादू शहर के सिर चढ़कर बोल रहा है। यही वजह है कि मेले के शुरुआती दो दिनों में ही 51 लाख रुपये से ज्यादा का कारोबार हो चुका है। ग्रामीण विकास विभाग और जीविका की यह पहल इस बार केवल सामान बेचने का जरिया नहीं रही, बल्कि ग्रामीण भारत के स्वाभिमान की जीती-जागती तस्वीर बन गई है।
15 राज्यों का हुनर एक ही छत के नीचे
ज्ञान भवन के भीतर कदम रखते ही ऐसा लगता है मानो पूरा हिंदुस्तान सिमटकर एक आंगन में आ गया हो। देश के 15 अलग-अलग राज्यों से आईं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अपनी पारंपरिक धरोहर लेकर यहां बैठी हैं। बिहार के पारंपरिक सिक्की घास से बनी डलिया हो या सुजनी कढ़ाई वाली चादरें, लोग इनकी बारीकी देखकर दंग हैं। भागलपुर के तसर सिल्क के कुर्ते और साड़ियां खरीदने के लिए महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। वहीं घरेलू खान-पान के शौकीनों के लिए गोविंद भोग चावल, मडुआ, बाजरा, रागी जैसे मोटे अनाज और घर के बने आम और मिर्च के अचार हाथों-हाथ बिक रहे हैं। मेले के फूड कोर्ट का मिजाज तो बिल्कुल त्योहार जैसा है। लिट्टी-चोखा और सेव-बुनिया की दुकानों पर टोकन लेने के लिए लोग अपनी बारी का इंतजार करते दिखते हैं। घर सजाने के शौकीन लोग मिट्टी के टेराकोटा शोपीस, कालीन और फलों के पौधे अपनी गाड़ियों में भर-भरकर ले जा रहे हैं।

गांव की रसोई से मॉल तक का सफर
इस मेले की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां गांव की महिलाएं सिर्फ सामान बेचकर घर लौटने के लिए नहीं आई हैं, बल्कि वे बड़े कारोबार के गुर भी सीख रही हैं। जीविका और अर्न्स्ट एंड यंग की देखरेख में रोजाना क्रेता-विक्रेता बैठक आयोजित की जा रही है। मंगलवार को जब ब्रीहति, नेचुरल बी फार्म और हनी हॉस्पिटैलिटी जैसी बड़ी कंपनियों के खरीदार पहुंचे, तो माहौल पूरी तरह पेशेवर नजर आया। इन कंपनियों के प्रतिनिधियों ने महिलाओं द्वारा तैयार शहद, मसाले और हस्तशिल्प को करीब से देखा और थोक सौदों के लिए बातचीत शुरू की। जीविका के विशेषज्ञों ने दीदियों को समझाया कि शहर के बड़े मॉल और ऑनलाइन बाजार में वही सामान लंबे समय तक टिकता है, जिसकी पैकेजिंग मजबूत हो और गुणवत्ता हमेशा एक जैसी रहे। जब एक महिला ने मुस्कुराते हुए अपनी बनाई टोकरी का सैंपल शहर के बड़े कारोबारी को सौंपा, तो उस पल में उसकी सालों की मेहनत सफल होती दिखाई दी।

अपनी पहचान और कमाई से खिली दीदियों की मुस्कान
मेले में स्टॉल लगाए महिलाओं की आंखों में अपनी पहचान बनने की खुशी साफ झलकती है। उनका कहना है कि पहले उनकी बनाई चीजें गांव के हाट-बाजार या रिश्तेदारों तक ही सीमित रह जाती थीं। बिचौलियों के चलते कभी सही दाम नहीं मिलता था। लेकिन ज्ञान भवन के इस मंच ने उन्हें सीधे हजारों ग्राहकों से रूबरू करा दिया है। अब वे खुद मोलभाव करती हैं, ग्राहकों की पसंद समझती हैं और मुनाफा सीधे उनके हाथ में आता है। डिजिटल इंडिया का असर भी यहां साफ झलकता है, क्योंकि सुदूर गांव से आई ये महिलाएं अब मोबाइल के क्यूआर कोड से धड़ल्ले से ऑनलाइन पेमेंट ले रही हैं। जिन ग्राहकों के पास नकदी की कमी है, उनके लिए परिसर में ग्राहक सेवा केंद्र की सुविधा दी गई है।
29 सितंबर तक चलने वाला यह मेला सुबह 10 बजे से रात 8 बजे तक आम लोगों के लिए खुला रहेगा। यह मेला सिर्फ खरीद-बिक्री का ठिकाना नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की कहानी है जहां गांव की साधारण महिलाएं अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भरता का नया इतिहास लिख रही हैं।
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