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New Delhi : चुनाव आयोग के भीतर अफसरों और आयुक्तों के बीच खींचतान की चर्चाओं पर आयोग ने खुद सामने आकर सफाई दी है। आयोग ने साफ कहा है कि किसी भी फैसले से पहले फाइलों पर अलग-अलग राय आना, आपत्तियां दर्ज होना या सवाल उठना किसी विवाद की निशानी नहीं, बल्कि एक सामान्य कामकाजी प्रक्रिया है। आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है, जहां अंतिम मुहर लगने से पहले हर मसौदे पर खुलकर बहस होती है। आयोग ने यह भी साफ किया कि पिछले एक साल में जितने भी बड़े नीतिगत कदम उठाए गए हैं, वे सभी मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की पूरी रजामंदी से ही लागू किए गए हैं।
अलग राय कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ताकत
आयोग ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 324 और वर्ष 2023 में बने नए चुनाव आयुक्त सेवा अधिनियम के तहत पूरा काम नियम-कायदों से चलता है। किसी भी फाइल पर जब कोई आयुक्त या अधिकारी अपनी लिखित टिप्पणी देता है, तो उसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि चुनावी प्रक्रिया में कोई कमी न रह जाए और आम वोटर के अधिकार सुरक्षित रहें। आयोग में सिर्फ तीनों आयुक्त ही नहीं, बल्कि नीचे से लेकर ऊपर तक हर अधिकारी को व्यवस्था सुधारने के लिए अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। किसी मसौदे पर चर्चा के दौरान उठी बातों को अंदरूनी कलह कहना संस्था के काम करने के तरीके को न समझने जैसा है।
दस महीने के कुछ नोट्स से पूरी तस्वीर नहीं बदलती
हालिया चर्चाओं पर आयोग ने कहा कि पिछले दस महीनों के दौरान लिखी गई कुछ चुनिंदा फाइलों या नोटिंग्स को बाहर निकालकर यह दिखाना कि सब कुछ ठीक नहीं है, पूरी तरह गलत है। इस दौरान आयोग ने जो बड़े कदम उठाए, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पिछले महीनों में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण से लेकर करीब चालीस नई चुनावी पहलों की शुरुआत की गई है। इसके अलावा बिहार, बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे बड़े राज्यों में चुनावों का सफल आयोजन भी इसी दौरान हुआ। ये सभी फैसले पूरे आयोग ने एकराय होकर लिए थे, न कि किसी एक व्यक्ति की मर्जी से।
वोटर डेटा पूरी तरह सुरक्षित, नियमों से ही कटते हैं नाम
डिजिटल सुरक्षा के मुद्दे पर आयोग ने स्पष्ट किया कि उसका ईसीआई-नेट पूरी तरह सुरक्षित प्रोटोकॉल पर काम करता है। राष्ट्रीय स्तर के डेटाबेस में किसी भी तरह की छेड़छाड़ को रोकने के लिए समय-समय पर सख्त सुरक्षा ऑडिट किए जाते हैं। इसके साथ ही मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार सिर्फ तय किए गए अफसरों यानी ईआरओ और डीईओ के पास होता है। आयोग ने दोहराया कि वह देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने और निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने वादे पर पूरी ईमानदारी से कायम है।
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