अपनी मनपसंद भाषा में पढ़ें :
Ranchi : राज्य की सत्ता का सबसे बड़ा चेहरा, कड़े सियासी फैसलों के लिए पहचानी जाने वाली शख्सियत और लाखों लोगों का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री। लेकिन इस एक तस्वीर में जो नजर आ रहा है, वह झारखंड का मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन नहीं है। यहां सिर्फ एक रोता-बिलखता बेटा है, जिसकी दुनिया आज उजड़ गई। मां की पार्थिव देह के पास बैठकर फफक-फफक कर आंसू बहाते हेमंत को देखकर वहां मौजूद हर आंख नम हो गई। सत्ता की हनक, राजनीति की ताकत और प्रशासनिक तामझाम इस दर्द के आगे बौना साबित हो गया। जिस मां ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वही जब हमेशा के लिए आंखें मूंद ले, तो इंसान चाहे कितना भी बड़ा बन जाए, वह भीतर से एकदम खाली हो जाता है।
मां के पार्थिव शरीर के सामने फफक-फफक कर रोये सीएम बेटे हेमंत सोरेन। पिता के जाने के ठीक एक साल बाद मां का साथ भी छूट गया।
#HemantSoren #rupiSoren #JharkhandNews #NewsSamvad #TrendingNews #LatestNews #TodayNews #RanchiNews https://t.co/PAyTp6prVh
— News Samvad (@newssamvaad) October 8, 2026
साल भर में सिर से उठ गया दोनों का हाथ, जिस छांव में पले वही पेड़ गिर गया
इस बेटे का दर्द इसलिए भी कहीं ज्यादा गहरा है, क्योंकि यह जख्म अभी बिल्कुल ताजा था। ठीक एक साल पहले ही पिता का साया सिर से उठा था। पिता के जाने का गम अभी दिल से उतरा भी नहीं था कि अब मां भी हाथ छुड़ाकर चली गईं। एक ही साल के भीतर जिंदगी के दोनों सबसे बड़े सहारे छिन जाना किसी भी इंसान को भीतर तक तोड़ देता है। बचपन से लेकर जवानी तक जिस मां के आंचल की छांव में सुकून मिलता था, जहां जाकर हर सियासी थकान और उलझन मिट जाती थी, वह दरवाजा अब हमेशा के लिए बंद हो गया। राजनीति के मैदान में हेमंत भले ही कितने भी मजबूत और अडिग दिखते हों, लेकिन आज अपनी मां के सामने वे सिर्फ एक लाचार औलाद थे, जो अपनी बेबसी पर आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी।
तरक्की के नशे में बिखरते रिश्तों के बीच एक आईना
आज का दौर ऐसा है जहां कामयाबी मिलते ही लोग अपने ही आंगन से दूर होने लगते हैं। थोड़ा सा पैसा, रुतबा या शोहरत आई नहीं कि बुजुर्ग माता-पिता कई लोगों को अपनी आजादी में रुकावट लगने लगते हैं। संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं और छोटे-छोटे घरों में सिमटती दुनिया को लोग नई सोच का नाम देने लगे हैं। ऐसे वक्त में हेमंत सोरेन का अपनी मां के लिए यह विलाप पूरे समाज को झकझोरता है। राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर भी वे कभी अपने मां-बाप के प्रति अपने फर्ज से पीछे नहीं हटे। सत्ता के व्यस्ततम दौर में भी माता-पिता की तीमारदारी करना, उनके पास बैठना और उनके लिए वही पुराना बेटा बने रहना दिखाता है कि असली संस्कार क्या होते हैं।
औलाद होना केवल जन्म लेने से तय नहीं होता। असली बेटा वही है जो मां-बाप के कमजोर पैरों की लाठी बने, उनके चेहरे की शिकन को पढ़े और उनके रहते हुए उनकी अहमियत को समझे। जब कोई अपना इस तरह हमेशा के लिए जाता है, तब समझ आता है कि दुनिया की कोई भी दौलत या ताकत मां की एक दुआ की बराबरी नहीं कर सकती।
इसे भी पढ़ें : पंचतत्व में विलीन हुईं रूपी सोरेन, भीगी आंखों से सीएम बेटे ने दी मुखाग्नि


