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Ranchi : अक्टूबर की ठंडी हवाएं, आसमान में छाए घने बादल और बीच-बीच में जमीन को भिगोती फुहारें। रांची का मोरहाबादी मैदान गुरुवार को एक अलग ही रंग में रंगा नजर आया। आमतौर पर ऐसी बिन-बुलाई बारिश त्योहारों के मौसम में मेलों की रौनक पर पानी फेर देती है, लेकिन यहां नजारा बिल्कुल जुदा था। कीचड़ और फिसलन से बेपरवाह लोग छाते संभाले स्टॉलों पर जुटे थे और कारीगरों के चेहरों पर मायूसी के बजाय एक अनोखी उम्मीद तैर रही थी। मौका था झारखंड आईएएस ऑफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन यानी जेसोवा के दीवाली मेला 2026 के आगाज का। यह सिर्फ दीवाली के दीये और झालर खरीदने की जगह भर नहीं है। यहां बिकने वाले हर सामान के पीछे किसी कारीगर का पसीना, किसी परिवार का सपना और किसी जरूरतमंद बच्चे की उम्मीद जुड़ी है।

बाजार से परे सेवा और संवेदना का मंच
मेले का उद्घाटन करते हुए राज्य के CS यानी मुख्य सचिव अविनाश कुमार ने इस आयोजन के गहरे मानवीय और सामाजिक पहलुओं को सामने रखा। उन्होंने कहा कि दिवाली मेला केवल व्यापार, खरीद-बिक्री और मुनाफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के वंचित तबकों के कल्याण, कला-संस्कृति के संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने का एक बेहद सशक्त माध्यम है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जेसोवा द्वारा इस तरह के जनकल्याणकारी प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं और इन्हें लगातार जारी रखा जाना चाहिए।
मुख्य सचिव ने मेले के संचालन को लेकर आयोजकों से भी दिल से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने अपील की कि पूरी आयोजन समिति तत्परता, पारदर्शिता, आत्मीयता और निष्ठा के साथ काम करे। उनका कहना था कि मेले में सबसे ज्यादा ध्यान स्टॉल संचालकों, कलाकारों और दूर-दराज से आने वाले आगंतुकों के हितों पर दिया जाना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि जब नीयत साफ हो और साझा प्रयास हों, तो मौसम की हर चुनौती के बीच भी यह मेला सफल होगा और यहाँ आने वाला हर व्यक्ति एक सुखद अनुभव लेकर अपने घर लौटेगा।

कारीगरों का हुनर सिर्फ सामान नहीं, उनकी भावनाओं का सजीव मंचन है
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए शिल्पकारों की मेहनत की सराहना करते हुए मुख्य सचिव ने कहा कि देश के कोने-कोने से आए कारीगरों ने अपने उत्पादों में जो हुनर और वैल्यू एडिशन जोड़ा है, वह केवल एक कारोबार नहीं है। यह उनकी कला की सुंदर प्रस्तुति और उनकी भावनाओं का जीता-जागता मंचन है।
अविनाश कुमार ने कहा कि यह मेला एक ऐसा साझा मंच बन गया है जहां विभिन्न क्षेत्रों की कला, संस्कृति और परंपराओं का जीवंत आदान-प्रदान होता है। लोग न सिर्फ इन अद्भुत हस्तनिर्मित उत्पादों को देख और खरीद रहे हैं, बल्कि अलग-अलग राज्यों से आए लोगों से मिलकर एक-दूसरे की मेहनत, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और परंपराओं को करीब से समझ पा रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यहाँ आने वाले सभी सृजनकर्ता और व्यवसायी अपार खुशियाँ बटोरकर लौटेंगे और पूरे हर्षोल्लास व उमंग के साथ अपनी दीवाली मनाएंगे।

आमदनी का मकसद सिर्फ जरूरतमंदों की भलाई और पुस्तकालयों का कायाकल्प
मुख्य सचिव ने जेसोवा के प्रयासों की सराहना करते हुए स्पष्ट किया कि इस मेले का मुख्य उद्देश्य कोई वित्तीय लाभ कमाना नहीं है। इससे जो भी सहयोग राशि जुटाई जाती है, उसका सीधा उपयोग समाज के उन वर्गों और वंचित समुदायों की भलाई के लिए होता है, जहां सरकारी प्रयासों के साथ-साथ इस तरह की मदद जिंदगी में बड़ा बदलाव ला देती है।
उन्होंने गर्व जताते हुए बताया कि इसी मेले के जरिए मिलने वाले सहयोग से ग्रामीण इलाकों के जर्जर पुस्तकालयों का कायाकल्प किया गया है। इन नई व्यवस्थाओं और किताबों का सहारा लेकर कई ग्रामीण बच्चों और युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की है। मुख्य सचिव ने कहा कि शिक्षा की लौ जलाने वाला यह प्रेरक सिलसिला बिना रुके आगे भी जारी रहना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने जेसोवा द्वारा विशेष बच्चों की प्रतिभा को निखारने, उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने और उनके सर्वांगीण विकास के लिए किए जा रहे कामों को भी खूब सराहा।

तीन जिलों के युवाओं को मिला नई किताबों का संबल
मुख्य सचिव की इन्हीं बातों की जमीनी झलक मंच पर भी साफ दिखाई दी। शिक्षा के प्रसार और जिलों में पढ़ाई का बेहतर माहौल तैयार करने के मकसद से जेसोवा ने तीन जिलों… चाईबासा, देवघर और दुमका—के पुस्तकालयों के विकास के लिए 15-15 लाख रुपये की सहयोग राशि सौंपी। इस सहायता से स्थानीय युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जरूरी किताबें, कौशल विकास के साधन और बेहतर अवसर अपने ही जिले में मिल सकेंगे।

इसके अलावा दिव्यांग बच्चों के हुनर को पंख देने वाली दो हस्तियों को भी मंच से सम्मानित किया गया। मूक-बधिर और दृष्टिबाधित बच्चों को सुर-ताल की शिक्षा देकर मुख्यधारा से जोड़ने वाली श्रेयशी बनर्जी को 96 हजार रुपये की मदद दी गई। वहीं, बच्चों में रचनात्मक सोच और आर्ट एंड क्राफ्ट को बढ़ावा देने के लिए स्वास्तिका बनर्जी को भी 96 हजार रुपये की राशि प्रदान की गई।
योजनाओं की पाठशाला और शाम की सुरमयी महफिल
मेले में खरीदारी के साथ-साथ जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देने का काम भी बखूबी चल रहा है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के स्टॉल पर लोग सरकारी योजनाओं की जानकारी ले रहे हैं। स्टॉल पर आम लोगों को निशुल्क पत्रिकाएं दी जा रही हैं और बड़ी एलईडी स्क्रीन के जरिए प्रेरक लघु फिल्में व डाक्यूमेंट्री दिखाकर जागरूक किया जा रहा है।

शाम ढलते ही मोरहाबादी मैदान की फिजा सुरों से महक उठी। सितार और सरोद की जुगलबंदी ने समां बांध दिया, तो सुगम संगीत और नृत्यों की प्रस्तुतियों पर पंडाल में मौजूद लोगों ने खूब तालियां बजाईं। बच्चों के लिए लगाया गया कठपुतली शो मेले का मुख्य आकर्षण बना रहा, जहां बच्चों की किलकारियां बारिश की बूंदों पर भारी पड़ रही थीं।
मौसम की मार से दुकानदारों को बचाने के लिए बढ़ा एक दिन
बारिश के मिजाज और दुकानदारों के हितों की चिंता करते हुए जेसोवा की अध्यक्ष प्रीति कुमार ने एक संवेदनशील निर्णय लिया। उन्होंने बताया कि मौसम की स्थिति और बारिश की संभावना को देखते हुए, मेले में आए छोटे वेंडर्स और कारीगरों को नुकसान से बचाने के लिए मेले की अवधि एक दिन बढ़ा दी गई है। अब यह मेला 2 नवंबर के बजाय 3 नवंबर तक आयोजित किया जाएगा।
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