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Pawan Thakur
कहते हैं कि जब किसी बात में अपनी मिट्टी की खुशबू और जड़ों से जुड़ाव हो, तो वह आवाज दूर तक गूंजती है। कुछ ऐसा ही नजारा नई दिल्ली के डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में देखने को मिला, जहां देश के नीति-निर्माता और दिग्गज जुटे हुए थे। MSME यानी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की यह बैठक यूं तो सरकारी कामकाज और भाषा की नीतियों पर केंद्रित थी, लेकिन माहौल उस वक्त बेहद खास हो गया जब बिहार के आरा की बहू और जानी-मानी साहित्यकार डॉ. अमरीन खान ने मंच से एक बेहद आत्मीय और विचारणीय बात कह दी। उन्होंने बहुत सधे हुए शब्दों में सवाल रख दिया कि जब हुनर हमारे अपने देश का है, पसीना हमारे कारीगरों का है, तो फिर डिब्बों पर ‘मेड इन इंडिया’ क्यों लिखा जाए, उस पर गर्व से ‘मेड इन भारत’ क्यों न दर्ज हो?

सात समंदर पार बज रहा हमारे हुनर का डंका, पर दिल में एक टीस बाकी
डॉ अमरीन खान ने मंच से अपनी बात रखते हुए देश के छोटे-मोटे कस्बों और गांवों से उठने वाले कारोबारियों की मेहनत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज हमारे देश के छोटे उद्योगों की पहुंच किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं रह गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन की वजह से खादी के कपड़े हों या उत्तर प्रदेश की ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना के नायाब नमूने, आज अमेरिका, लंदन, दुबई और ईरान जैसे देशों के बाजारों में भारतीय सामान अपनी अलग चमक बिखेर रहे हैं। वहां के मॉल्स और दुकानों में जब कोई विदेशी ग्राहक हमारे हुनर को पसंद करता है, तो हर हिंदुस्तानी का सीना चौड़ा हो जाता है।
पर इसी गौरव के बीच उन्होंने उस कसक को भी सामने रखा जो अक्सर दिल में कहीं दबकर रह जाती है। अमरीन ने कहा कि जब उन पैकेटों पर नजर जाती है और वहां बड़े-बड़े अक्षरों में ‘मेड इन इंडिया’ दिखता है, तो मन में कहीं न कहीं यह खयाल कौंधता है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी हम अपने मूल नाम से थोड़ा हिचकते क्यों हैं? उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी पहचान ‘भारत’ है और अगर हमारे छोटे उद्योग अपने पैकेट पर ‘मेड इन भारत’ लिखेंगे, तो यह सिर्फ एक शब्द का बदलाव नहीं होगा, बल्कि हमारी जड़ों, संस्कृति और स्वाभिमान का दुनिया भर में सबसे बड़ा ऐलान होगा।

केंद्रीय मंत्री ने थपथपाई पीठ, बोले- बात सीधी प्रधानमंत्री तक पहुंचेगी
डॉ अमरीन की इस भावनात्मक और वजनदार मांग ने पूरे हॉल का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। मंच पर मौजूद केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने उनकी इस बात को बहुत गंभीरता से सुना और तुरंत सराहना की। उन्होंने माना कि यह सुझाव सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि देश के गौरव से जुड़ा मामला है। मांझी ने भरोसा दिलाया कि इस मुद्दे को यूं ही फाइलों में बंद नहीं रहने दिया जाएगा, बल्कि वे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि इसे अमलीजामा पहनाया जा सके।
इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री ने यह भी जोड़ा कि हिंदी और अपनी भाषाओं का प्रचार-प्रसार सिर्फ दिल्ली के बड़े सभागारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसी चर्चाओं को जिलों और छोटे कस्बों तक ले जाना जरूरी है ताकि आम आदमी भी अपनी भाषा और संस्कृति से दिल से जुड़ सके। बैठक के दौरान मंत्रालय की पत्रिका और पुस्तकों का विमोचन भी हुआ, जहां केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और सचिव भरत खेड़ा समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। भोजपुर की बहू की इस पहल ने साफ कर दिया कि जब सोच अपनी जमीन से जुड़ी हो, तो बदलाव की बयार राजधानी तक जरूर पहुंचती है।
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