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Home » निर्भया केस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए फांसी की सजा बरकरार
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निर्भया केस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा-पुनर्विचार याचिका में कोई नए तथ्य नहीं, इसलिए फांसी की सजा बरकरार

December 18, 2019No Comments4 Mins Read
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप और हत्या के एक दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आर. भानुमति की अध्यक्षता वाली बेंच ने अक्षय के लिए तय की गई फांसी की सजा पर मुहर लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि याचिका में वही दलीलें दी गईं हैं जो हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील में दी गईं थीं।

आज सुनवाई के दौरान अक्षय की ओर से वकील एपी सिंह ने कहा कि पीड़ित युवती का दोस्त पैसे लेकर मीडिया को इंटरव्यू दे रहा था, इसलिए उसकी गवाही विश्वसनीय नहीं है। तब जस्टिस भूषण ने कहा कि इसका इस मामले से क्या संबंध है। तब एपी सिंह ने रेयान इंटरनेशनल केस में स्कूल छात्र की हत्या का उदाहरण देते हुए कहा कि इस मामले में बेकसूर को फंसा दिया गया था। अगर सीबीआई की तफ्तीश नहीं होती तो सच सामने नहीं आता। इसलिए हमने इस केस में भी सीबीआई जैसी एजेंसी से जांच की मांग की थी। एपी सिंह ने तिहाड़ के पूर्व जेल अधिकारी सुनील गुप्ता की किताब का जिक्र किया जिसमें इस बात की संभावना व्यक्त की गई है कि राम सिंह की जेल में हत्या की गई थी। उन्होंने कहा कि यह नए तथ्य हैं, जिन पर कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम लेखक की बातों पर नहीं जाना चाहते हैं। ये एक खतरनाक ट्रेंड होगा कि अगर लोगों ने ट्रायल के बाद किताबें लिखना शुरू कर दिया तो ये सही नहीं होगा। अगर कोर्ट ऐसी बातों पर ध्यान देने लगेगी तो इस बहस का कोई अंत न होगा ।

एपी सिंह ने अक्षय की ओर से बहस करते हुए कहा कि कलयुग में लोग केवल 60 साल तक जीते हैं जबकि दूसरे युग में और ज़्यादा जीते थे। दिल्ली में वायु प्रदूषण और पानी की गुणवक्ता बेहद खराब है, ऐसे में फांसी की सजा क्यों। एपी सिंह ने कहा कि पीड़ित युवती लगातार मॉर्फिन के नशे में थी तो उसका आखिरी बयान कैसे संभव हुआ। उससे समय-समय पर 3 बयान लिए गए जिनमें विरोधाभास है। इस पर कोर्ट ने कहा कि आप हमें ठोस बात बताएं कि हमारे फैसले में कमी क्या है? तब एपी सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी कहा था कि मौत की सजा उचित समाधान नहीं है। अपराधियों को पुनर्वास का मौका मिलना चाहिए। गरीब लोग अपने लिए सही से कानूनी उपाय नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें मौत की सजा दी जाती है। मौत की सजा मानवाधिकारों का उल्लंघन है और ये भारत विरोधी संस्कृति का लक्षण है। इस पर जस्टिस भानुमति ने कहा कि आप ठोस व कानूनी तथ्य रखें और बताएं कि हमारे फैसले में क्या कमी थी और क्यों हमें पुनर्विचार करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सभी दलीलों और सबूतों को परखने के बाद फांसी की सजा सुनाई है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना। यह अपराध इतना गंभीर है जिसे भगवान भी माफ़ नहीं कर सकता, इसके लिए सिर्फ़ फांसी की ही सजा हो सकती है। मेहता ने कहा कि ऐसे राक्षसों को पैदा कर ईश्वर भी शर्मसार होता होगा, इनसे कोई रहम नहीं होनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि निर्भया गैंगरेप के चारों दोषियों मुकेश, अक्षय, पवन और विनय को साकेत की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी, जिस पर 14 मार्च 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जिस पर सुनवाई करते हुए फांसी की सजा पर रोक लगाई थी।9 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने मुकेश, पवन और विनय के रिव्यू पिटीशन को खारिज करते हुए उनकी फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी।

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